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Atharvaveda - Mantra 30

Atharvaveda 12/4/30

5 Sukta
53 Mantra
12/4/30
Devata- वशा Rishi- कश्यपः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- वशा गौ सूक्त
Mantra with Swara
आ॒विरा॒त्मानं॑ कृणुते य॒दा स्थाम॒ जिघां॑सति। अथो॑ ह ब्र॒ह्मभ्यो॑ व॒शा या॒च्ञाय॑ कृणुते॒ मनः॑ ॥

आ॒वि: । आ॒त्मान॑म्। कृ॒णु॒ते॒ । य॒दा । स्थाम॑ । जिघां॑सति । अथो॒ इति॑ । ह॒ । ब्र॒ह्मऽभ्य॑: । व॒शा । या॒ञ्चाय॑ । कृ॒णु॒ते॒ । मन॑: ॥४.३०॥

Mantra without Swara
आविरात्मानं कृणुते यदा स्थाम जिघांसति। अथो ह ब्रह्मभ्यो वशा याच्ञाय कृणुते मनः ॥

आवि: । आत्मानम्। कृणुते । यदा । स्थाम । जिघांसति । अथो इति । ह । ब्रह्मऽभ्य: । वशा । याञ्चाय । कृणुते । मन: ॥४.३०॥

Meaning
१. (यदा) = जब एक ब्राह्मण [ब्रह्म-वेद-को जानने का इच्छुक पुरुष] (स्थाम जिघांसति) = शक्ति व स्थिरता को प्राप्त करने की कामना करता है, तब यह वशा [वेदवाणी] उसके लिए (आत्मानं आविः कृणुते) = अपने को प्रकट करती है। उससे तत्त्वज्ञान को प्राप्त करके ही वासनात्मक जगत् से ऊपर उठकर शक्ति व स्थिरता का सम्पादन करता है। २. (अथो ह) = और अब ही (वशा) = यह वेदवाणी (ब्रह्मभ्यः याच्छ्याय) = ज्ञानों की याचना के लिए (मनः कृणुते) = मन को करती है, अर्थात् यह वशा अपने अध्येता के मन को इस रूप में प्रेरित करती है कि वह अधिकाधिक ज्ञान का पिपासु होता जाता है।
Essence
वेदवाणी का प्रकाश उसी के लिए होता है जो शक्ति व स्थिरता के सम्पादन के लिए यत्न करता है। वेदवाणी इसके मन को अधिकाधिक ज्ञान की ओर आकृष्ट करती है।
Subject
ज्ञान की अधिकाधिक पिपासा

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