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Atharvaveda - Mantra 26

Atharvaveda 12/4/26

5 Sukta
53 Mantra
12/4/26
Devata- वशा Rishi- कश्यपः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- वशा गौ सूक्त
Mantra with Swara
अ॒ग्नीषो॑माभ्यां॒ कामा॑य मि॒त्राय॒ वरु॑णाय च। तेभ्यो॑ याचन्ति ब्राह्म॒णास्तेष्वा वृ॑श्च॒तेऽद॑दत् ॥

अ॒ग्नीषोमा॑भ्याम् । कामा॑य । मि॒त्राय॑ । वरु॑णाय । च॒ । तेभ्य॑: । या॒च॒न्ति॒ । ब्रा॒ह्म॒णा: । तेषु॑ । आ । वृ॒श्च॒ते॒ । अद॑दत् ॥४.२६॥

Mantra without Swara
अग्नीषोमाभ्यां कामाय मित्राय वरुणाय च। तेभ्यो याचन्ति ब्राह्मणास्तेष्वा वृश्चतेऽददत् ॥

अग्नीषोमाभ्याम् । कामाय । मित्राय । वरुणाय । च । तेभ्य: । याचन्ति । ब्राह्मणा: । तेषु । आ । वृश्चते । अददत् ॥४.२६॥

Meaning
१. (ब्राह्मणा:) = ज्ञानरुचिवाले विद्वान् (अग्निषोमाभ्याम्) = शरीर में अग्नि व सोम तत्व की ठीक स्थिति के लिए, (कामाय) = इष्ट पदार्थों की प्राप्ति के लिए और (मित्राय वरुणाय च) = प्राणापान के ठीक से कार्य करने के लिए (तेभ्य:) = उन ज्ञानियों से (याचन्ति) = कमनीय देववाणी की याचना करते हैं। यह वेदवाणी उन्हें अग्नि व सोम आदि को प्राप्त करानेवाली बनेगी। २. एक गोपति (अददत्) = उन ब्राह्मणों के लिए इस वेदवाणी को न देता हुआ (तेषु आवश्ते) = उन 'अग्रि, सोम, काम व मित्र-वरुण' से छिन्न हो जाता है, इस वेदवाणी को छिपानेवाले के जीवन में अग्नि, सोम आदि की ठीक स्थिति नहीं होती।
Essence
वेदवाणी को अपनाने का लाभ यह है कि हमारे जीवन में अग्नि, सोम आदि तत्त्वों की उचित स्थिति होती है। यह गोपति इस वेदवाणी को ब्राह्मणों के लिए न देता हुआ इन अग्नि, सोम आदि को छिन्न कर बैठता है।
Subject
अग्रि, सोम, काम, मित्र, वरुण

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