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Atharvaveda - Mantra 24

Atharvaveda 12/4/24

5 Sukta
53 Mantra
12/4/24
Devata- वशा Rishi- कश्यपः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- वशा गौ सूक्त
Mantra with Swara
दे॒वा व॒शाम॑याच॒न्यस्मि॒न्नग्रे॒ अजा॑यत। तामे॒तां वि॑द्या॒न्नार॑दः स॒ह दे॒वैरुदा॑जत ॥

दे॒वा: । व॒शाम् । अ॒या॒च॒न् । यस्मि॑न् । अग्रे॑ । अजा॑यत । ताम् । ए॒ताम् । वि॒द्या॒त् । नार॑द: । स॒ह । दे॒वै: । उत् । आ॒ज॒त॒ ॥४.२४॥

Mantra without Swara
देवा वशामयाचन्यस्मिन्नग्रे अजायत। तामेतां विद्यान्नारदः सह देवैरुदाजत ॥

देवा: । वशाम् । अयाचन् । यस्मिन् । अग्रे । अजायत । ताम् । एताम् । विद्यात् । नारद: । सह । देवै: । उत् । आजत ॥४.२४॥

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Meaning
१. (यस्मिन्) = जिसमें (अग्ने अजायत) = सबसे प्रथम अथवा सृष्टि के प्रारम्भ में इस वेदवाणी का प्रादुर्भाव हुआ, (देवा:) = देवों ने (वशाम् अयाचन्) = उनसे इस वेदवाणी की याचना की। प्रभु ने सष्टि के आरम्भ में 'अग्नि' आदि के हृदयों में इस वेदवाणी का प्रादुर्भाव किया। उनसे अन्य देवों ने इसकी याचना की और इसप्रकार गुरु-शिष्य परम्परा से इसका ज्ञान संसार में प्रसृत हुआ। २. (ताम् एताम्) = सृष्टि के प्रारम्भ में दी गई इस वेदवाणी को (विद्यात्) = मनुष्य जानता है और (नार-द:) = नारद बनता है-नर-सम्बन्धी इन्द्रियों, मन व बुद्धि को शुद्ध करनेवाला बनता है [नरसम्बन्धिनं नारं दायति]। यह (देवैः सह) = दिव्य गुणों के साथ सम्पृक्त हुआ-हुआ (उद् आजत) = उत्कृष्ट मार्ग पर गतिवाला होता है।
Essence
प्रभु ने वेदवाणी का प्रादुर्भाव अग्नि आदि के हृदयों में किया। उनसे अन्य देवों ने इस वेदज्ञान को प्राप्त किया। वेदज्ञान द्वारा वे शुद्ध इन्द्रिय व प्रशस्त मन, बुद्धिवाले बने और दिव्यगुणों के साथ उत्कृष्ट मार्ग पर गतिवाले हुए।

 
Subject
नारदः