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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 12/4/2

5 Sukta
53 Mantra
12/4/2
Devata- वशा Rishi- कश्यपः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- वशा गौ सूक्त
Mantra with Swara
प्र॒जया॒ स वि क्री॑णीते प॒शुभि॒श्चोप॑ दस्यति। य आ॑र्षे॒येभ्यो॒ याच॑द्भ्यो दे॒वानां॒ गां न दित्स॑ति ॥

प्र॒ऽजया॑ । स: । वि । क्री॒णी॒ते॒ । प॒शुऽभि॑: । च॒ । उप॑ । द॒स्य॒ति॒ । य: । आ॒र्षे॒येभ्य॑: । याच॑त्ऽभ्य: । दे॒वाना॑म् । गाम् । न । दित्स॑ति ॥४.२॥

Mantra without Swara
प्रजया स वि क्रीणीते पशुभिश्चोप दस्यति। य आर्षेयेभ्यो याचद्भ्यो देवानां गां न दित्सति ॥

प्रऽजया । स: । वि । क्रीणीते । पशुऽभि: । च । उप । दस्यति । य: । आर्षेयेभ्य: । याचत्ऽभ्य: । देवानाम् । गाम् । न । दित्सति ॥४.२॥

Meaning
१.प्रभ ने सृष्टि के प्रारम्भ में इस वेदवाणीरूप गौ को 'अग्नि, वाय, आदित्य व अङ्गिरा' इन देवों को प्राप्त कराया, अत: यह वेदधेनु 'देवों की गौ' कहलाती है। इस (देवानां गाम्) = देवधेनु को (यः) = जो (याचभ्य:) = याचना करनेवाले (आर्षेयेभ्य:) = ऋषि सन्तानों के लिए-पवित्राचरण जिज्ञासुओं के लिए (न दित्सति) = नहीं देना चाहता है, (स:) = वह (प्रजया विक्रीणीते) = प्रजा के साथ अपने को बेच डालता है, अर्थात् ऐसा राष्ट्र परतन्त्र हो जाता है (च) = और (पशुभिः उपदस्यति) = वह पशुओं से क्षीण हो जाता है। ऐसे राष्ट्र में गवादि पशु भी उत्तम दूध आदि देनेवाले नहीं रहते।
Essence
जिस राष्ट्र में राजा वेदज्ञान के प्रसार के लिए प्रयत्नशील नहीं होता वह राष्ट्र परतन्त्र और उत्तम पशुओं से रहित हो जाता है।
Subject
देवों की गौ

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