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Atharvaveda - Mantra 19

Atharvaveda 12/4/19

5 Sukta
53 Mantra
12/4/19
Devata- वशा Rishi- कश्यपः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- वशा गौ सूक्त
Mantra with Swara
दु॑रद॒भ्नैन॒मा श॑ये याचि॒तां च॒ न दित्स॑ति। नास्मै॒ कामाः॒ समृ॑ध्यन्ते॒ यामद॑त्त्वा॒ चिकी॑र्षति ॥

दु॒र॒द॒भ्ना । ए॒न॒म् । आ । श॒ये॒ । या॒चि॒ताम् । च॒ । न । दित्स॑ति । न । अ॒स्मै॒ । कामा॑: । सम । ऋ॒ध्य॒न्ते॒ । याम् । अद॑त्वा । चिकी॑र्षति ॥४.१९॥

Mantra without Swara
दुरदभ्नैनमा शये याचितां च न दित्सति। नास्मै कामाः समृध्यन्ते यामदत्त्वा चिकीर्षति ॥

दुरदभ्ना । एनम् । आ । शये । याचिताम् । च । न । दित्सति । न । अस्मै । कामा: । सम । ऋध्यन्ते । याम् । अदत्वा । चिकीर्षति ॥४.१९॥

Meaning
१. (दुरदभ्ना) = कभी न दबनेवाली यह वशा [वेदवाणी] (एनम्) = इस व्यक्ति में (आशये) = निवास करती है (च) = और फिर भी (याचितां न दित्सति) = माँगी हुई को यह देना नहीं चाहता, अर्थात् यदि कोई उस वेदज्ञान को प्राप्त करने के लिए उसके समीप आता है और यह उसे देता नहीं तो (अस्मै) = इसके लिए (कामाः न समृध्यन्ते) = इष्ट वस्तुएँ समृद्ध नहीं होती-इसकी कामनाएँ पूर्ण नहीं होती। २. (याम्) = जिस भी कामना को यह (अदत्त्वा) = वेदवाणी को न देकर (चिकीर्षति) = करना चाहता है, उसमें यह असफल ही हो जाता है। वेदवाणी का ज्ञान न देकर यदि यह किन्हीं अन्य व्यापार आदि में प्रवृत्त होता है, तो उसमें असफल ही हो जाता है।
Essence
हमें वेदज्ञान प्राप्त हो तो हम उसके प्रसार के लिए सदा यत्नशील हों। इसका प्रसार न करके अन्य व्यापारों में प्रवृत्त होंगे तो हमारे वे व्यापार समृद्ध न होंगे।
Subject
दुरदभ्ना

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