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Atharvaveda - Mantra 54

Atharvaveda 12/3/54

5 Sukta
60 Mantra
12/3/54
Devata- स्वर्गः, ओदनः, अग्निः Rishi- यमः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- स्वर्गौदन सूक्त
Mantra with Swara
त॒न्वं स्व॒र्गो ब॑हु॒धा वि च॑क्रे॒ यथा॑ वि॒द आ॒त्मन्न॒न्यव॑र्णाम्। अपा॑जैत्कृ॒ष्णां रुश॑तीं पुना॒नो या लोहि॑नी॒ तां ते॑ अ॒ग्नौ जु॑होमि ॥

त॒न्व᳡म् ।स्व॒:ऽग: । ब॒हु॒ऽधा । वि । च॒क्रे॒ । यथा॑ । वि॒दे । आ॒त्मन् । अ॒न्यऽव॑र्णाम् । अप॑ । अ॒जै॒त् । कृ॒ष्णाम् । रुश॑तीम् । पु॒ना॒न: । या । लोहि॑नी । ताम् । ते॒ । अ॒ग्नौ । जु॒हो॒मि॒ ॥३.५४॥

Mantra without Swara
तन्वं स्वर्गो बहुधा वि चक्रे यथा विद आत्मन्नन्यवर्णाम्। अपाजैत्कृष्णां रुशतीं पुनानो या लोहिनी तां ते अग्नौ जुहोमि ॥

तन्वम् ।स्व:ऽग: । बहुऽधा । वि । चक्रे । यथा । विदे । आत्मन् । अन्यऽवर्णाम् । अप । अजैत् । कृष्णाम् । रुशतीम् । पुनान: । या । लोहिनी । ताम् । ते । अग्नौ । जुहोमि ॥३.५४॥

Meaning
१. (स्वर्ग:) = [स्वः गच्छति] प्रकाश को प्राप्त होनेवाला व्यक्ति (तन्वम्) = अपने शरीर को (बहुधा) = नाना प्रकार से (विचक्रे) = विशिष्ट [भिन्न-भिन्न] रूपों में करता है। वैसे-वैसे ही वह इस कार्य को कर पाता है, (यथा) = जिस-जिस प्रकार वह इस तनू को (आत्मन्) = अपने अन्दर (अन्यवर्णाम् विदे) = विलक्षण वर्णीवाली जान पाता है। वह देखता है कि जिस अजा [प्रकृति] से उसका यह शरीर बना है वह अजा लोहित, शुक्ल व कृष्णावर्णा है। उसका शरीर व शरीरस्थ मन भी परिणामतः लोहित, शुक्ल व कृष्णावृत्तियोंवाला है। ये वृतियाँ ही क्रमश: 'राजसी, सात्त्विक व तामसी' कहलाती हैं। ३. यह (स्वर्ग:) = प्रकाश को प्राप्त होनेवाला व्यक्ति (कृष्णाम् अपाजैत्) = कृष्णावर्णा तामसीवृत्ति को अपने से दूर करता है-इसे सुदूर पराजित करके नष्ट करनेवाला होता है। (रुशतीम्) = दीप्त [Bright] सात्त्विकी वृत्ति को (पुनानः) = पवित्र व परिमार्जित करता है और (या लोहिनी) = जो रक्तवर्णा राजसी वृत्ति है, (ते ताम्) = हे प्रभो! आपकी बनाई हुई उस वृत्ति को (अग्नौ जुहोमि) = प्रगतिशीलता में आहुत [अर्पित] करता हूँ, अर्थात् रजोगुण का वह 'स्वर्ग' [प्रकाश की ओर चलनेवाला व्यक्ति] इतना ही लाभ लेने का प्रयत्न करता है कि इसकी क्रियाशीलता बनी रहे, अर्थात् यह रजोगुण उसे सत्त्वगुण में आगे बढ़ने में सहायक हो।
Essence
हम अपने अन्दर विविध वर्ण की वृत्तियों को जानकर तामसीवृत्ति को दूर करें, सात्त्विक वृत्ति को अधिकाधिक पवित्र करते हुए राजसी वृत्ति को उसकी सहायिका बनाएँ, अर्थात् रजोगुण के कारण सत्वगुण क्रियाशील बना रहे और हम सात्विक भावों में आगे बढ़ते चलें।
Subject
कृष्णा, रुशती, लोहिनी

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