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Atharvaveda - Mantra 46

Atharvaveda 12/3/46

5 Sukta
60 Mantra
12/3/46
Devata- स्वर्गः, ओदनः, अग्निः Rishi- यमः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- स्वर्गौदन सूक्त
Mantra with Swara
स॒त्याय॑ च॒ तप॑से दे॒वता॑भ्यो नि॒धिं शे॑व॒धिं परि॑ दद्म ए॒तम्। मा नो॑ द्यू॒तेऽव॑ गा॒न्मा समि॑त्यां॒ मा स्मा॒न्यस्मा॒ उत्सृ॑जता पु॒रा मत् ॥

स॒त्याय॑ । च॒ । तप॑से । दे॒वता॑भ्य: । नि॒ऽधिम् । शे॒व॒ऽधिम् । परि॑ । द॒द्म॒: । ए॒तम् । मा । न॒: । द्यू॒ते । अव॑ । गा॒त् । मा । सम्ऽइ॑त्याम् । मा । स्म॒ । अ॒न्यस्मै॑ । उत् । सृ॒ज॒त॒ । पु॒रा । मत् ॥३.४६॥

Mantra without Swara
सत्याय च तपसे देवताभ्यो निधिं शेवधिं परि दद्म एतम्। मा नो द्यूतेऽव गान्मा समित्यां मा स्मान्यस्मा उत्सृजता पुरा मत् ॥

सत्याय । च । तपसे । देवताभ्य: । निऽधिम् । शेवऽधिम् । परि । दद्म: । एतम् । मा । न: । द्यूते । अव । गात् । मा । सम्ऽइत्याम् । मा । स्म । अन्यस्मै । उत् । सृजत । पुरा । मत् ॥३.४६॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. प्रभु जीव से कहते हैं कि (एतं निधिम्) = इस वीर्यरूप निधि को तथा (शेवधिम्) = [ Valuable treasure] धन को (परिदद्म:) = तेरे लिए देते हैं ताकि तू (सत्याय) = सत्ययुक्त जीवन को बिता सके, (तपसे) = तपस्वी जीवन को बिता सके (च) = तथा (देवताभ्यः) = दिव्यगुणों को धारण कर सके। अशक्ति व निर्धनता में 'सत्य, तप व देववृत्ति' की साधना सम्भव नहीं। २. (नः) = हमसे दिया गया वह धन द्(युते मा अवगात्) = जुए में न चला जाए और (मा समित्याम्) = संग्रामों में या महफ़िलों में नष्ट न हो जाए। (मत्) = मुझसे (पुरा) = [for the defence of] सत्य आदि के रक्षण के लिए प्रास इस धन को (अन्यस्मै) = 'सत्य, तप व देवताओं' से भिन्न बातों के लिए (मा उत्सजृत) = मत दे डालो।
Essence
प्रभु हमें वीर्यरूप निधि व लक्ष्मी [धन] को प्रास कराते हैं ताकि हमारा जीवन "सत्य, तप व देववृत्ति' वाला बन सके। हम इस धन को जुए व लड़ाइयों व महफ़िलों में ही नष्ट न कर दें। प्रभु-प्रदत्त धन को 'सत्य, तप व देववृत्ति' के रक्षण का साधन ही बनाएँ।
Subject
सत्य, तप व देववृत्ति