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Atharvaveda - Mantra 42

Atharvaveda 12/3/42

5 Sukta
60 Mantra
12/3/42
Devata- स्वर्गः, ओदनः, अग्निः Rishi- यमः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Suktam- स्वर्गौदन सूक्त
Mantra with Swara
नि॒धिं नि॑धि॒पा अ॒भ्येनमिच्छा॒दनी॑श्वरा अ॒भितः॑ सन्तु॒ ये॒न्ये। अ॒स्माभि॑र्द॒त्तो निहि॑तः स्व॒र्गस्त्रि॒भिः काण्डै॒स्त्रीन्त्स्व॒र्गान॑रुक्षत् ॥

नि॒ऽधिम् । नि॒धि॒ऽपा: । अ॒भि । ए॒न॒म् । इ॒च्छा॒त् । अनी॑श्वरा: । अ॒भित॑: । स॒न्तु॒ । ये । अ॒न्ये । अ॒स्माभि॑: । द॒त्त: । निऽहि॑त: । स्व॒:ऽग: । त्रि॒ऽभि: । काण्डै॑: । त्रीन् । स्व॒:ऽगान् । अ॒रु॒क्ष॒त् ॥३.४२॥

Mantra without Swara
निधिं निधिपा अभ्येनमिच्छादनीश्वरा अभितः सन्तु येन्ये। अस्माभिर्दत्तो निहितः स्वर्गस्त्रिभिः काण्डैस्त्रीन्त्स्वर्गानरुक्षत् ॥

निऽधिम् । निधिऽपा: । अभि । एनम् । इच्छात् । अनीश्वरा: । अभित: । सन्तु । ये । अन्ये । अस्माभि: । दत्त: । निऽहित: । स्व:ऽग: । त्रिऽभि: । काण्डै: । त्रीन् । स्व:ऽगान् । अरुक्षत् ॥३.४२॥

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Meaning
१. (निधिपाः) = वीर्यरूप निधि की रक्षा करनेवाला (एनं निधिम्) = इस वीर्य-निधि को (अभीच्छात्) = सब प्रकार से प्राप्त करना चाहे। इस वीर्यरूप निधि का वह सब प्रकार से रक्षण करे। (ये अन्ये) = जो इन वीर्य-निधि के रक्षकों से भिन्न व्यक्ति हैं, अर्थात् जो इस निधि के महत्व को न समझते हुए इसका रक्षण नहीं करते वे (अभितः अनीश्वरा: सन्तु) = इहलोक व परलोक दोनों के दृष्टिकोण से ऐश्वर्यरहित हों-न वे अभ्युदय को प्राप्त करें, न नि:श्रेयस को। २. (अस्माभिः) = हमसे तो यह वीर्य-निधि (दत्त:) = [देङ् पालने] रक्षित हुआ है, इसीलिए (स्वर्ग: निहित:) = हमारे लिए स्वर्ग स्थापित हुआ है। मनुष्य को चाहिए कि वह वीर्यरक्षण द्वारा 'ज्ञान, कर्म व उपासना' रूप (त्रिभिः काण्डै:) = तीन काण्डों के द्वारा-जीवन के इन तीन नियमों के द्वारा (त्रीन् स्वर्गान् अरुक्षत्) = तीन स्वर्गों का आरोहण करे । कर्मकाण्ड द्वारा शरीर को सशक्त व स्वस्थ बनाए। उपासना काण्ड द्वारा हृदय को निर्मल बनाए। ज्ञानकाण्ड द्वारा मस्तिष्क को दीप्त रक्खे ।
Essence
वीर्यरक्षण के अभाव में न अभ्युदय की प्राप्ति है, न निःश्रेयस का सम्भव। वीर्यरक्षक के लिए ही स्वर्ग है। यह वीर्यरक्षक पुरुष ज्ञान, कर्म व उपासना द्वारा 'धुलोक [मस्तिष्क], पृथिवीलोक [शरीर] व अन्तरिक्षलोक [हृदय] का विजय करता है।
Subject
वीर्य-निधि का रक्षण