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Atharvaveda - Mantra 38

Atharvaveda 12/3/38

5 Sukta
60 Mantra
12/3/38
Devata- स्वर्गः, ओदनः, अग्निः Rishi- यमः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- स्वर्गौदन सूक्त
Mantra with Swara
उपा॑स्तरी॒रक॑रो लो॒कमे॒तमु॒रुः प्र॑थता॒मस॑मः स्व॒र्गः। तस्मि॑ञ्छ्रयातै महि॒षः सु॑प॒र्णो दे॒वा ए॑नं दे॒वता॑भ्यः॒ प्र य॑च्छान् ॥

उप॑ । अ॒स्त॒री॒: । अक॑र: । लो॒कम् । ए॒तम् । उ॒रु: । प्र॒थ॒ता॒म् । अस॑म: । स्व॒:ऽग: । तस्मि॑न् । श्र॒या॒तै॒ । म॒हि॒ष: । सु॒ऽप॒र्ण: । दे॒वा: । ए॒न॒म् । दे॒वता॑भ्य: । प्र । य॒च्छा॒न् ॥३.३८॥

Mantra without Swara
उपास्तरीरकरो लोकमेतमुरुः प्रथतामसमः स्वर्गः। तस्मिञ्छ्रयातै महिषः सुपर्णो देवा एनं देवताभ्यः प्र यच्छान् ॥

उप । अस्तरी: । अकर: । लोकम् । एतम् । उरु: । प्रथताम् । असम: । स्व:ऽग: । तस्मिन् । श्रयातै । महिष: । सुऽपर्ण: । देवा: । एनम् । देवताभ्य: । प्र । यच्छान् ॥३.३८॥

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Meaning
१. (उप अस्तरी:) = तूने उस अमृत प्रभु को अपना उपस्तरण बनाया है-प्रभु की गोद में बैठा है। इस प्रकार (एतं लोकं अकर:) = इस प्रकाश को-आलोक को प्राप्त [सिद्ध] किया है। अब तेरे लिए यह (उरु:) = विशाल (असम:) = [षम वैक्लव्ये] सब व्याकुलताओं से शून्य (स्वर्ग: प्रथताम्) = सुखमय लोक विस्तृत हो। प्रभुस्मरण व प्रकाश के होने पर हमारा लोक क्यों न स्वर्ग बनेगा? २. (तस्मिन्) = उस स्वर्ग में वह (छ्र्यातै) = आश्रय करता है, जोकि (महिष:) = [मह पूजायाम्] प्रभु का पूजन करनेवाला और (सुपर्ण:) = उत्तम पालनात्मक व पूरणात्मक कर्मों में व्याप्त रहता है। (एनम्) = इस महिष सुपर्ण' को (देवा:) = देववृत्ति के पुरुष (देवताभ्य:) = दिव्यवृत्तियों के लिए (प्रयच्छान्) = प्राप्त कराएँ। यह साधक देवों के सम्पर्क में दिव्यवृत्तिवाला बने।
Essence
प्रभु की गोद में स्थित होने व प्रकाश प्राप्त करने पर जीवन सुखमय बनता है। इस स्वर्ग में-सुखमय जीवन में वही निवास करता है जो प्रभुपूजन करता हुआ सर्वभूतहितरत रहता है। देवों के सम्पर्क में यह सदा देववृत्तिवाला बनता है।
Subject
महिषः सुपर्णः