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Atharvaveda - Mantra 37

Atharvaveda 12/3/37

5 Sukta
60 Mantra
12/3/37
Devata- स्वर्गः, ओदनः, अग्निः Rishi- यमः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- स्वर्गौदन सूक्त
Mantra with Swara
उप॑ स्तृणीहि प्र॒थय॑ पु॒रस्ता॑द्घृ॒तेन॒ पात्र॑म॒भि घा॑रयै॒तत्। वा॒श्रेवो॒स्रा तरु॑णं स्तन॒स्युमि॒मं दे॑वासो अभि॒हिङ्कृ॑णोत ॥

उप॑ । स्तृ॒णी॒हि॒ । प्र॒थय॑ । पु॒रस्ता॑त् । घृ॒तेन॑ । पात्र॑म् । अ॒भि । धा॒र॒य॒ । ए॒तत्‌ । वा॒श्राऽइ॑व । उ॒स्रा । तरु॑णम् । स्त॒न॒स्युम्। इ॒मम् । दे॒वा॒स॒: । अ॒भि॒ऽहिङ्कृ॑णोत ॥३.३७॥

Mantra without Swara
उप स्तृणीहि प्रथय पुरस्ताद्घृतेन पात्रमभि घारयैतत्। वाश्रेवोस्रा तरुणं स्तनस्युमिमं देवासो अभिहिङ्कृणोत ॥

उप । स्तृणीहि । प्रथय । पुरस्तात् । घृतेन । पात्रम् । अभि । धारय । एतत्‌ । वाश्राऽइव । उस्रा । तरुणम् । स्तनस्युम्। इमम् । देवास: । अभिऽहिङ्कृणोत ॥३.३७॥

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1 Bhashyas
Meaning
१.हे साधक! तू (उपस्तृणीहि) = उस अमृत प्रभु को अपना उपस्तरण बना [अमृतोपस्तरण मसि]-प्रभु की गोद में स्थित हो। उस प्रभु को ही (पुरस्तात् प्रथय) = अपने सामने विस्तृत कर सदा प्रभुस्मरण करनेवाला बन-प्रभु से ओझल न हो। इस प्रकार (एतत् पात्रम्) = इस शरीररूप पात्र को घतेन ज्ञानदीप्ति के द्वारा (अभिधारय) = क्षरित मलोंवाला व दीप्तिवाला बना। २. हे (देवास:) = देववृत्ति के पुरुषो! इम (अभिहिकृणोत) = इस प्रभु के प्रति प्रेम से स्तुतिवचनों का इस प्रकार उच्चरण करो, (इव) = जैसेकि (वाश्रा उत्रा) = रंभाती हुई गौ (तरुणम्) = तरुण (स्तनस्युम्) = स्तन के दूध पीने की इच्छावाले बछड़े के प्रति शब्द करती है।
Essence
हम प्रभु की गोद में बैठे, सदा प्रभु का स्मरण करें, ज्ञान द्वारा शरीर को पवित्र व दीप्त बनाएँ। प्रभु के प्रति प्रेम से स्तोत्रों का उच्चारण करें।
Subject
प्रभु की गोद में