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Atharvaveda - Mantra 34

Atharvaveda 12/3/34

5 Sukta
60 Mantra
12/3/34
Devata- स्वर्गः, ओदनः, अग्निः Rishi- यमः Chhanda- विराड्गर्भा त्रिष्टुप् Suktam- स्वर्गौदन सूक्त
Mantra with Swara
ष॒ष्ट्यां श॒रत्सु॑ निधि॒पा अ॒भीच्छा॒त्स्वः प॒क्वेना॒भ्यश्नवातै। उपै॑नं जीवान्पि॒तर॑श्च पु॒त्रा ए॒तं स्व॒र्गं ग॑म॒यान्त॑म॒ग्नेः ॥

ष॒ष्ट्याम् । श॒रत्ऽसु॑ । नि॒धि॒ऽपा: । अ॒भि । इ॒च्छा॒त् । स्व᳡: । प॒क्वेन॑ । अ॒भि । अ॒श्न॒वा॒तै॒ । उप॑ । ए॒न॒म् । जी॒वा॒न् । पि॒तर॑: । च॒ । पु॒त्रा: । ए॒तम् । स्व॒:ऽगम् । ग॒म॒य॒ । अन्त॑म् । अ॒ग्ने: ॥३.३४॥

Mantra without Swara
षष्ट्यां शरत्सु निधिपा अभीच्छात्स्वः पक्वेनाभ्यश्नवातै। उपैनं जीवान्पितरश्च पुत्रा एतं स्वर्गं गमयान्तमग्नेः ॥

षष्ट्याम् । शरत्ऽसु । निधिऽपा: । अभि । इच्छात् । स्व: । पक्वेन । अभि । अश्नवातै । उप । एनम् । जीवान् । पितर: । च । पुत्रा: । एतम् । स्व:ऽगम् । गमय । अन्तम् । अग्ने: ॥३.३४॥

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Meaning
१. (षष्टयां शरत्सु) = जीवन के प्रथम साठ वर्षों में (निधिपाः) = वीर्यरूप निधि [वास्तविक सम्पत्ति] का रक्षक पुरुष (स्वः अभि इच्छात्) = स्वर्ग को प्राप्त करने की कामना करे। यह (पक्वेन) = अपने परिपक्व ज्ञान से अथवा शक्ति के परिपाक से (अभि अश्नवातै) = [स्वः] स्वर्ग को प्राप्त करनेवाला बनता है। यदि एक व्यक्ति ब्रह्मचर्य व गृहस्थ में शक्तिरूप निधि का रक्षण करता है और ज्ञान की परिपक्वता के लिए प्रयत्न करता है, तो उसका घर स्वर्ग क्यों न बनेगा? २. (एनम्) = इसके आश्रय में (पितरः पुत्राः च उपजीवान्) = इसके वृद्ध माता-पिता व सन्तान सुखी व सुन्दर जीवनवाले हों। यह घर में वृद्ध माता-पिता की सेवा करे और सन्तानों का सुन्दर निर्माण करे। हे प्रभो! (एनम्) = इस निधिपा पुरुष को (अग्नेः) = अग्नि के आहवनीय अग्नि के (अन्तम्) = सुन्दर (स्वर्गं गमय) = स्वर्ग को प्राप्त कराइए। यह घर में यज्ञों को करता हुआ घर को स्वर्ग बनाने में समर्थ हो।
Essence
जीवन के प्रथम साठ वर्षों में हम वीर्यरूपनिधि का रक्षण करनेवाले बनें [बाद में तो रक्षण स्वतः ही हो जाता है 'धातुषु क्षीयमाणेषु शमः कस्य न जायते']। शक्तिरक्षण व परिपक्व ज्ञान से हम घर को स्वर्ग बनाएँ। यहाँ पितरों का आदर करें व सन्तानों के निर्माण का ध्यान करें तभी हमारा घर 'यज्ञशील पुरुष का सुन्दर स्वर्ग' बनेगा।
Subject
षष्ट्यां शरत्सु निधिपाः