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Atharvaveda - Mantra 30

Atharvaveda 12/3/30

5 Sukta
60 Mantra
12/3/30
Devata- स्वर्गः, ओदनः, अग्निः Rishi- यमः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- स्वर्गौदन सूक्त
Mantra with Swara
उत्था॑पय॒ सीद॑तो बु॒ध्न ए॑नान॒द्भिरा॒त्मान॑म॒भि सं स्पृ॑शन्ताम्। अमा॑सि॒ पात्रै॑रुद॒कं यदे॒तन्मि॒तास्त॑ण्डु॒लाः प्र॒दिशो॒ यदी॒माः ॥

उत् । स्था॒प॒य॒ । सीद॑त: । बु॒ध्ने । ए॒ना॒न् । अ॒त्ऽभि: । आ॒त्मान॑म् । अ॒भि । सम् ।स्पृ॒श॒न्ता॒म् । अमा॑सि । पात्रै॑: । उ॒द॒कम् । यत् । ए॒तत् । मि॒ता: । त॒ण्डु॒ला: । प्र॒ऽदिश॑: । यदि॑ । इ॒मा: ॥३.३०॥

Mantra without Swara
उत्थापय सीदतो बुध्न एनानद्भिरात्मानमभि सं स्पृशन्ताम्। अमासि पात्रैरुदकं यदेतन्मितास्तण्डुलाः प्रदिशो यदीमाः ॥

उत् । स्थापय । सीदत: । बुध्ने । एनान् । अत्ऽभि: । आत्मानम् । अभि । सम् ।स्पृशन्ताम् । अमासि । पात्रै: । उदकम् । यत् । एतत् । मिता: । तण्डुला: । प्रऽदिश: । यदि । इमा: ॥३.३०॥

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Meaning
१.हे राजन! (बुध्ने) = तले [Bottom] में (सीदत:) = बैठे हुए-अतिनिकृष्ट स्थिति में पहुँचे हुए (एनान्) = इन प्राकृत जनों को (उत्थापय) = तू ऊपर उठा-इनके अन्दर तू ज्ञान का प्रकाश प्राप्त कराने का प्रयत्न कर। ये प्राकृत जन (अद्भिः) = ज्ञानजलों से (आत्मानं अभिसंस्पृशन्ताम्) = अपने को सब ओर से संसृष्ट करें। यह ज्ञानजल इनकी शुद्धि का कारण बने। २. (यत् एतत् उतकम्) = जो यह ज्ञानजल है, इसे तू (पात्रैः) = योग्य व्यक्तियों के द्वारा (अमासि) = [मा Assign, mete out] इन अध:पतित लोगों में प्राप्त कराता है, (यदि इमा: प्रदिश:) = यदि इन सब प्रकृष्ट दिशाओं में फैले हुए भी ये (तण्डुला:) = विध्वंसकारी पुरुष हैं तो भी वे (मिता:) = [Cast, thrown out] राष्ट्र से दूर कर दिये जाते हैं। ज्ञान-प्रकाश से इनके जीवन अपकर्षशून्य होने लगते हैं और वे भी धीमे-धीमे पवित्र जीवनवाले हो जाते हैं।
Essence
राजा का यह कर्तव्य है कि पात्र [योग्य] व्यक्तियों द्वारा राष्ट्र में सर्वत: ज्ञान के प्रसार का प्रबन्ध करे, जिससे सब प्रजाएँ ज्ञान-जल में शुद्ध जीवनवाली बनकर ऊपर उठें राष्ट्र में किसी का जीवन अतिनिकृष्ट न रह जाए।
Subject
पात्रों द्वारा ज्ञान-प्रसार