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Atharvaveda - Mantra 29

Atharvaveda 12/3/29

5 Sukta
60 Mantra
12/3/29
Devata- स्वर्गः, ओदनः, अग्निः Rishi- यमः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- स्वर्गौदन सूक्त
Mantra with Swara
उद्यो॑धन्त्य॒भि व॑ल्गन्ति त॒प्ताः फेन॑मस्यन्ति बहु॒लांश्च॑ बि॒न्दून्। योषे॑व दृ॒ष्ट्वा पति॒मृत्वि॑यायै॒तैस्त॑ण्डु॒लैर्भ॑वता॒ समा॑पः ॥

उत् । यो॒ध॒न्ति॒ । अ॒भि । व॒ल्ग॒न्ति॒। त॒प्ता: । फेन॑म् । अ॒स्य॒न्ति॒ । ब॒हु॒लान् । च॒ । बि॒न्दून् । योषा॑ऽइव । दृ॒ष्ट्वा । पति॑म् । ऋत्वि॑जाय । ए॒तै: । त॒ण्डु॒लै: । भ॒व॒त॒ । सम् । आ॒प॒: ॥३.२९॥

Mantra without Swara
उद्योधन्त्यभि वल्गन्ति तप्ताः फेनमस्यन्ति बहुलांश्च बिन्दून्। योषेव दृष्ट्वा पतिमृत्वियायैतैस्तण्डुलैर्भवता समापः ॥

उत् । योधन्ति । अभि । वल्गन्ति। तप्ता: । फेनम् । अस्यन्ति । बहुलान् । च । बिन्दून् । योषाऽइव । दृष्ट्वा । पतिम् । ऋत्विजाय । एतै: । तण्डुलै: । भवत । सम् । आप: ॥३.२९॥

Meaning
१. प्राकृतजन तो (उद्योधन्ति) = परस्पर युद्ध करने लगते हैं, (अभिवल्गन्ति) = एक दूसरे पर आक्रमण करते हैं, (तप्ता:) = क्रोधसंतप्त हुए-हुए (फेनम् अस्यन्ति) = ओष्ठप्रान्तों से आग को छोड़ते हैं, (च) = और (बहुलान् बिन्दून्) = कितनी ही थूक [ष्ठीवन] की बून्हें उनके मुख से गिरती है, अर्थात् ये प्राकृतजन क्रोध में उन्मत्त-से हो जाते हैं और भला करनेवाले पर भी आक्रमण कर बैठते हैं। २. ऐसा होने पर भी हे (आप:) = आम पुरुषो! आप (ऐतैः तण्डुलै:) = [तदि विध्वंसे] विवंसकारी पुरुषों के साथ भी इस प्रकार प्रेम से (सम्भवत) = मेलवाले होओ-इन्हें भी इसप्रकार प्रेम से ज्ञान देनेवाले बनो (इव) = जैसेकि (योषा) = पत्नी (पतिं दृष्ट्वा) = पति को देखकर (ऋत्वियाय) = ऋतु धर्म के लिए मेलवाली होती है। हे आप्त पुरुषो! इन विध्वंसकों को भी आप इसीप्रकार प्रेम से ज्ञान दो।
Essence
प्राकृतजन क्रोध में आकर लड़ते हैं, एक-दूसरे पर आक्रमण करते हैं, क्रोधोन्मत्त होने पर इनके मुख से आग ब थूक भी गिरने लगती है। फिर भी आप्त संन्यासियों को इन्हें प्रेम से ज्ञान देना ही है। इन्हें अक्रोध से उन प्राकृतजनों के क्रोध को जीतना है।

 
Subject
अक्रोधेन जयेत् क्रोधम्

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