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Atharvaveda - Mantra 28

Atharvaveda 12/3/28

5 Sukta
60 Mantra
12/3/28
Devata- स्वर्गः, ओदनः, अग्निः Rishi- यमः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- स्वर्गौदन सूक्त
Mantra with Swara
संख्या॑ता स्तो॒काः पृ॑थि॒वीं स॑चन्ते प्राणापा॒नैः संमि॑ता॒ ओष॑धीभिः। असं॑ख्याता ओ॒प्यमा॑नाः सु॒वर्णाः॒ सर्वं॒ व्यापुः॒ शुच॑यः शुचि॒त्वम् ॥

सम्ऽख्या॑ता: । स्तो॒का: । पृ॒थि॒वीम् । स॒च॒न्ते॒ । प्रा॒णा॒पा॒नै: । सम्ऽमि॑ता: । ओष॑धीभि: । अस॑म्ऽख्याता: । आ॒ऽउ॒प्यमा॑ना: । सु॒ऽवर्णा॑: । सर्व॑म्‌ । वि । आ॒पु॒: । शुच॑य: । शु॒चि॒ऽत्वम् ॥३.२८॥

Mantra without Swara
संख्याता स्तोकाः पृथिवीं सचन्ते प्राणापानैः संमिता ओषधीभिः। असंख्याता ओप्यमानाः सुवर्णाः सर्वं व्यापुः शुचयः शुचित्वम् ॥

सम्ऽख्याता: । स्तोका: । पृथिवीम् । सचन्ते । प्राणापानै: । सम्ऽमिता: । ओषधीभि: । असम्ऽख्याता: । आऽउप्यमाना: । सुऽवर्णा: । सर्वम्‌ । वि । आपु: । शुचय: । शुचिऽत्वम् ॥३.२८॥

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Meaning
१. (संख्याताः) = [चक्ष् ख्या to perceive] सत्य का दर्शन किये हुए, (स्तोका:) = [षुच् प्रसादे] प्रसन्नचित्तवाले ये संन्यस्त पुरुष-संन्यासी (पृथिवीं सचन्ते) = इस पृथिवी के साथ पृथिवीस्थ प्राणियों के साथ मेलवाले होते हैं। ज्ञान देने के द्वारा उनके कल्याण के लिए यत्नशील होते हैं। ये संन्यस्त (प्राणापानैः) = प्राणापान की शक्तियों से तथा (ओषधीभिः) = ओषधियों से (संमिता:) = समित-उपमित होते हैं। ये ही वस्तुतः राष्ट्र के प्राणापान-जीवन के रक्षक होते हैं तथा दोषों को दग्ध [उष दाहे] करनेवाले होते हैं। २. (असंख्याता:) = [संख्या to be connected with] किन्हीं के साथ भी अपने को सम्बद्ध न करते हुए ये (ओप्यमानाः) = चारों ओर ज्ञान को फैलाते हुए [ज्ञान का वपन करते हुए] (सुवर्णा:) = उत्तम रूप में प्रभु के गुणों का प्रतिपादन करते हुए (शचयः) = पवित्र जीवनवाले (सर्वं शुचित्वम् व्यापुः) = पूर्ण पवित्रता का व्यापन करनेवाले होते हैं। पवित्रता को व्याप्त करनेवाले ये पुरुष ही 'आप्त' कहलाते हैं। इनके शब्द लोगों के लिए प्रमाणभूत होते हैं।
Essence
संन्यस्त पुरुष 'सत्यदर्शी, सदा प्रसन्न, प्रजाओं के प्राण व दोषदग्धा' होते हैं। ये अनासक्त भाव से ज्ञान का प्रसार करते हैं। प्रभु के गुणों का सम्यक् प्रतिपादन करते हुए पवित्रता से व्याप्त जीवनवाले 'आप्त' पुरुष होते हैं।
Subject
संख्याताः अपि असंख्याता: