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Atharvaveda - Mantra 24

Atharvaveda 12/3/24

5 Sukta
60 Mantra
12/3/24
Devata- स्वर्गः, ओदनः, अग्निः Rishi- यमः Chhanda- जगती Suktam- स्वर्गौदन सूक्त
Mantra with Swara
अ॒ग्निः पच॑न्रक्षतु त्वा पु॒रस्ता॒दिन्द्रो॑ रक्षतु दक्षिण॒तो म॒रुत्वा॑न्। वरु॑णस्त्वा दृंहाद्ध॒रुणे॑ प्र॒तीच्या॑ उत्त॒रात्त्वा॒ सोमः॒ सं द॑दातै ॥

अ॒ग्नि: । पच॑न् । र॒क्ष॒तु॒ । त्वा॒ । पु॒रस्ता॑त् । इन्द्र॑: । र॒क्ष॒तु॒ । द॒क्षि॒ण॒त: ।म॒रुत्वा॑न् । वरु॑ण: । त्वा॒ । दृं॒हा॒त् । ध॒रुणे॑ । प्र॒तीच्या॑: । उ॒त्त॒रात् । त्वा॒ । सोम॑: । सम् । द॒दा॒तै॒ ॥३.२५॥

Mantra without Swara
अग्निः पचन्रक्षतु त्वा पुरस्तादिन्द्रो रक्षतु दक्षिणतो मरुत्वान्। वरुणस्त्वा दृंहाद्धरुणे प्रतीच्या उत्तरात्त्वा सोमः सं ददातै ॥

अग्नि: । पचन् । रक्षतु । त्वा । पुरस्तात् । इन्द्र: । रक्षतु । दक्षिणत: ।मरुत्वान् । वरुण: । त्वा । दृंहात् । धरुणे । प्रतीच्या: । उत्तरात् । त्वा । सोम: । सम् । ददातै ॥३.२५॥

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Meaning
१. (पुरस्तात्) = पूर्व की ओर से (पचन् अग्नि:) = तेरी शक्तियों का परिपाक करता हुआ अग्रणी प्रभु (त्वा रक्षतु) = तेरी रक्षा करे। प्रथमाश्रम में प्रभु को 'अग्नि' नाम से स्मरण करता हुआ निरन्तर आगे बढ़नेवाला बन और अपनी शक्तियों का ठीक से परिपाक कर। २. (मरुत्वान्) = मरुतों [प्राणों]-वाला (इन्द्रः) = शत्रुविद्रावक सर्वेश्वर्यसम्पन्न प्रभु (दक्षिणत: रक्षतु) = दक्षिण की ओर से तेरी रक्षा करे। हम द्वितीयाश्रम में प्राणसाधना करते हुए जितेन्द्रिय बनकर दाक्षिण्य प्राप्त करें और ऐश्वर्य को सिद्ध करें। ३. वरुण:-सब पापों का निवारण करनेवाला प्रभु (प्रतीच्याः) = पश्चिम दिशा से (त्वा) = तुझे (धरुणे दृहांत्) = धारणात्मक कर्म में दृढ़ करे। अब वानप्रस्थाश्रम में हम प्रत्याहार का पाठ पढ़ते हुए [प्रति अञ्च] सब विषयों से अपना निवारण करें [वरुण] और चित्तवृत्ति को सुस्थिर करने का प्रयत्न करें [धरुण]। ४. अब (सोमः) = वे शान्त प्रभु (उत्तरात्) = उत्तर से (त्वा) = तुझे (संददातै) = सम्यक् प्रजा के लिए दें। चतुर्थाश्रम में संन्यस्त होकर हम उत्तम जीवनवाले शान्त [सोम] बनकर प्रजाहित में प्रवृत्त हों और सब लोगों के लिए ज्ञान का प्रकाश प्राप्त कराएँ।
Essence
प्रथमाश्रम में हम ठीक प्रकार से शक्तियों का परिपाक करें। द्वितीयाश्रम में प्राणसाधना द्वारा जितेन्द्रिय बने रहकर विषयासक्त होने से बचें। तृतीयाश्रम में सब विषयों का निवारण करके स्थिरवृत्तिता का अभ्यास करें। चतुर्थाश्रम में शान्त व सौम्य बनकर सर्वत्र प्रकाश फैलाएँ।
Subject
'अग्नि, इन्द्र, वरुण, सोम'