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Atharvaveda - Mantra 23

Atharvaveda 12/3/23

5 Sukta
60 Mantra
12/3/23
Devata- स्वर्गः, ओदनः, अग्निः Rishi- यमः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- स्वर्गौदन सूक्त
Mantra with Swara
जनि॑त्रीव॒ प्रति॑ हर्यासि सू॒नुं सं त्वा॑ दधामि पृथि॒वीं पृ॑थि॒व्या। उ॒खा कु॒म्भी वेद्यां॒ मा व्य॑थिष्ठा यज्ञायु॒धैराज्ये॒नाति॑षक्ता ॥

जनि॑त्रीऽइव । प्रति॑ । ह॒र्या॒सि॒ । सू॒नुम् । सम् । त्वा॒ । द॒धा॒मि॒ । पृ॒थि॒वीम् । पृ॒थि॒व्या । उ॒खा । कु॒म्भी । वेद्या॑म् । मा । व्य॒थि॒ष्ठा॒: । य॒ज्ञ॒ऽआ॒यु॒धै: । आज्ये॑न । अति॑ऽसक्ता ॥३.२३॥

Mantra without Swara
जनित्रीव प्रति हर्यासि सूनुं सं त्वा दधामि पृथिवीं पृथिव्या। उखा कुम्भी वेद्यां मा व्यथिष्ठा यज्ञायुधैराज्येनातिषक्ता ॥

जनित्रीऽइव । प्रति । हर्यासि । सूनुम् । सम् । त्वा । दधामि । पृथिवीम् । पृथिव्या । उखा । कुम्भी । वेद्याम् । मा । व्यथिष्ठा: । यज्ञऽआयुधै: । आज्येन । अतिऽसक्ता ॥३.२३॥

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Meaning
१. प्रभु प्रजा से कहते हैं कि तू (प्रतिहर्यासि) = प्रत्येक के साथ इसप्रकार स्नेह करनेवाली हो, (इव) = जैसेकि (जनित्री सूनुम्) = माता पुत्र को प्रेम करती है। (पृथिवीं त्वा) = शक्तियों के विस्तारवाली तुझको (पृथिव्या) = शक्ति-विस्तार के साथ (संदधामि) = सम्यक् धारण करता हूँ। परस्पर प्रेम से वर्तना भी शक्तियों की स्थिरता का साधन बनता है। २. तु उसी प्रकार (मा व्यथिष्ठा:) = व्यथित न हो, जैसेकि (वेद्याम्) = वेदी में (यज्ञायुधैः) = यज्ञ के उपकरणों के साथ (आज्येन अतिषक्ता) = घृत से अतिशयेन मेलवाली (उखा) = कुण्ड व (कुम्भी) = जलपात्र पीड़ित न हों, अर्थात् तेरे घर में यज्ञ होते रहें और तेरा जीवन सर्वथा सुखमय बना रहे।
Essence
हम परस्पर प्रेम से वरतें तथा हमारे घरों में यज्ञों की परिपाटी ठीक प्रकार से चलती रहे। इसप्रकार हमारी शक्तियाँ सुस्थिर रहेगी और हमारा जीवन सुखमय बनेगा।
Subject
परस्पर स्नेह व यज्ञशीलता