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Atharvaveda - Mantra 20

Atharvaveda 12/3/20

5 Sukta
60 Mantra
12/3/20
Devata- स्वर्गः, ओदनः, अग्निः Rishi- यमः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- स्वर्गौदन सूक्त
Mantra with Swara
त्रयो॑ लो॒काः संमि॑ता॒ ब्राह्म॑णेन॒ द्यौरे॒वासौ पृ॑थि॒व्यन्तरि॑क्षम्। अं॒शून्गृ॑भी॒त्वान्वार॑भेथा॒मा प्या॑यन्तां॒ पुन॒रा य॑न्तु॒ शूर्प॑म् ॥

त्रय॑: । लो॒का: । सम्ऽमि॑ता: । ब्राह्म॑णेन । द्यौ: । ए॒व । अ॒सौ । पृ॒थि॒वी । अ॒न्तरि॑क्षम् । अं॒शून् । गृ॒भी॒त्वा । अ॒नु॒ऽआर॑भेथाम् । आ । प्या॒य॒न्ता॒म् । पुन॑: । आ । य॒न्तु॒ । शूर्प॑म् ॥३.२०॥

Mantra without Swara
त्रयो लोकाः संमिता ब्राह्मणेन द्यौरेवासौ पृथिव्यन्तरिक्षम्। अंशून्गृभीत्वान्वारभेथामा प्यायन्तां पुनरा यन्तु शूर्पम् ॥

त्रय: । लोका: । सम्ऽमिता: । ब्राह्मणेन । द्यौ: । एव । असौ । पृथिवी । अन्तरिक्षम् । अंशून् । गृभीत्वा । अनुऽआरभेथाम् । आ । प्यायन्ताम् । पुन: । आ । यन्तु । शूर्पम् ॥३.२०॥

Meaning
१. (ब्राह्मणेन) = ब्रह्मज्ञानी पुरुष ने (त्रयः लोका:) = तीनों लोक-द्(यौः एव असौ, पृथिवी, अन्तरिक्षम्) = 'निश्चय से धुलोक, अन्तरिक्ष और पृथिवी' (संमिता:) = सम्यक निर्मित किये हैं। इसने अपने मस्तिष्करूप धुलोक को ज्ञानसूर्य से दीप्त किया है, हदयान्तरिक्ष को चन्द्र की शीतल ज्योत्स्ना से आनन्दमय बनाया है तथा पृथिवीरूप शरीर को शक्ति की अग्नि से युक्त किया है। २. हे पति-पत्नी! तुम भी (अंशून् गभीत्वा) = इस ब्रह्मज्ञानी से ज्ञानरश्मियों को प्राप्त करके (अन्वारभेथाम्) = अपने कर्तव्यकर्मों का आरम्भ करो। इसप्रकार ही सब गुण (आप्यायन्ताम्) = तुम्हारे अन्दर बढ़ें और (पुन:) = फिर-फिर (शर्पम्) = इस छाजरूप वृद्ध ब्राह्मण के समीप (आयन्तु) = तुम आओ और अपने जीवन के दोषरूप अज्ञान को अपने से पृथक् करनेवाले बनो।
Essence
ब्राह्मण वह है जोकि अपने शरीर, मन व मस्तिष्क को सुन्दर बनाता है। इसके सम्पर्क में ज्ञानरश्मियों को प्राप्त करके मनुष्य अपने कर्तव्य कर्मों को करे । इन ब्राह्मणों के सम्पर्क में हम दोषों को दूर करते हुए निरन्तर वृद्धि को प्राप्त हों।
Subject
ब्राह्मण कौन?

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