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Atharvaveda - Mantra 15

Atharvaveda 12/3/15

5 Sukta
60 Mantra
12/3/15
Devata- स्वर्गः, ओदनः, अग्निः Rishi- यमः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- स्वर्गौदन सूक्त
Mantra with Swara
वन॒स्पतिः॑ स॒ह दे॒वैर्न॒ आग॒न्रक्षः॑ पिशा॒चाँ अ॑प॒बाध॑मानः। स उच्छ्र॑यातै॒ प्र व॑दाति॒ वाचं॒ तेन॑ लो॒काँ अ॒भि सर्वा॑ञ्जयेम ॥

वन॒स्पति॑: । स॒ह । दे॒वै: । न॒: । आ । अ॒ग॒न् । रक्ष॑: । पि॒शा॒चान् । अ॒प॒ऽबाध॑मान: । स: । उत् । श्र॒या॒तै॒ । प्र । व॒दा॒ति॒ । वाच॑म् । तेन॑ । लो॒कान्। अ॒भि । सर्वा॑न् । ज॒ये॒म॒ ॥३.१५॥

Mantra without Swara
वनस्पतिः सह देवैर्न आगन्रक्षः पिशाचाँ अपबाधमानः। स उच्छ्रयातै प्र वदाति वाचं तेन लोकाँ अभि सर्वाञ्जयेम ॥

वनस्पति: । सह । देवै: । न: । आ । अगन् । रक्ष: । पिशाचान् । अपऽबाधमान: । स: । उत् । श्रयातै । प्र । वदाति । वाचम् । तेन । लोकान्। अभि । सर्वान् । जयेम ॥३.१५॥

Meaning
१. (वनस्पति:) = पवित्र वानस्पतिक भोजन (देवैः सह) = दिव्यगुणों के साथ (न: आगन्) = हमें प्राप्त हो। हम वानस्पतिक भोजन ही करें। इस प्रकार मांसाहार से आ जानेवाली स्वार्थ व क्रूरता आदि की वृत्तियों से बचे रहें। यह भोजन (रक्षः) = रोगकृमियों को (पिशाचान्) = पैशाचिक वृत्तियों को (अपबाधमान:) = हमसे दूर रक्खे। २. (स:) = वानस्पतिक भोजन करनेवाला वह 'यम' [संयमी पुरुष] (उच्छ्यातै) = उत्कृष्ट मार्ग का सेवन करता है। यह (वाचं प्रददाति) = स्तुतिवचनों का उच्चारण करता है। (तेन) = इस प्रकार की वृत्ति के द्वारा (सर्वान् लोकान् अभिजयेम) = हम सब लोकों का विजय करनेवाले बनें । पृथिवीलोक, अन्तरिक्षलोक व द्युलोक का विजय करते हुए ब्रहालोक को प्राप्त करें।
Essence
वानस्पतिक भोजन हमें दिव्यवृत्तिवाला बनाता है-राक्षसीभावों को दूर करता है। हम उत्कृष्ट जीवनवाले बनकर प्रभुस्तवन की वृत्तिवाले बनते हैं और सब लोकों का विजय करते हुए ब्रह्मलोक को प्रास करते हैं।
Subject
वानस्पतिक भोजन का महत्त्व

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