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Atharvaveda - Mantra 11

Atharvaveda 12/3/11

5 Sukta
60 Mantra
12/3/11
Devata- स्वर्गः, ओदनः, अग्निः Rishi- यमः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- स्वर्गौदन सूक्त
Mantra with Swara
ध्रु॒वेयं वि॒राण्नमो॑ अस्त्व॒स्यै शि॒वा पु॒त्रेभ्य॑ उ॒त मह्य॑मस्तु। सा नो॑ देव्यदिते विश्ववार॒ इर्य॑ इव गो॒पा अ॒भि र॑क्ष प॒क्वम् ॥

ध्रु॒वा । इ॒यम् । वि॒ऽराट् । नम॑: । अ॒स्तु॒ । अ॒स्यै । शि॒वा । पु॒त्रेभ्य॑: । उ॒त । मह्य॑म् । अ॒स्तु॒ । सा । न: । दे॒वि॒ । अ॒दि॒ते॒ । वि॒श्व॒ऽवा॒रे॒ । इर्य॑:ऽइव। गो॒पा: । अ॒भि । र॒क्ष॒ । प॒क्वम्॥३.११॥

Mantra without Swara
ध्रुवेयं विराण्नमो अस्त्वस्यै शिवा पुत्रेभ्य उत मह्यमस्तु। सा नो देव्यदिते विश्ववार इर्य इव गोपा अभि रक्ष पक्वम् ॥

ध्रुवा । इयम् । विऽराट् । नम: । अस्तु । अस्यै । शिवा । पुत्रेभ्य: । उत । मह्यम् । अस्तु । सा । न: । देवि । अदिते । विश्वऽवारे । इर्य:ऽइव। गोपा: । अभि । रक्ष । पक्वम्॥३.११॥

Meaning
१. (इयं भुवा) = यह ध्रुवादिक् (विराट्) = विशिष्ट ही दीसिवाली है-ध्रुवता में ही इसकी शोभा है। (अस्यै नमः अस्तु) = इसके लिए नमस्कार हो। इस ध्रुवादिक से हम भी ध्रुवता का पाठ पढ़ते है । इसप्रकार ध्रुवता-स्थिरता का पाठ पढ़ाती हुई यह (पुत्रेभ्य:) = हमारे सन्तानों के लिए (उत) = और (मह्यम्) = मेरे लिए (शिवा अस्तु) = कल्याणकर हो। अस्थिरता में कोई भी उन्नति सम्भव नहीं होती। सब उत्कर्ष इस ध्रुवता से ही प्राप्य हैं। २. हे (देवि) = दिव्यगुणों को प्राप्त करानेवाली, (अदिते) = स्वास्थ्य को न नष्ट होने देनेवाली [अदिति, दो अवखण्डने] (विश्ववारे) = सबसे वरने योग्य ध्रुवादिक (सा) = वह तू (न:) = हमारे लिए (इर्यः इव) = [Destroying the enemies] सब शत्रुओं को नष्ट करनेवाली है। (गोपा:) = तू हमारा रक्षण करती है। तू (पक्वम् अभिरक्ष) = हमारे अन्दर परिपक्व वीर्य का रक्षण करनेवाली हो। स्थिरवृत्ति में ही वीर्यरक्षण सम्भव है।

 
Essence
हम ध्रुवा दिक् से ध्रुवता का पाठ पढ़ें। यह ध्रुवता हमारा कल्याण करे। यह "दिव्यगुणों को प्राप्त करानेवाली व स्वास्थ्य को सुरक्षित रखनेवाली है। यह हमारे शत्रुओं को नष्ट करके हमारा रक्षण करती है। यह ध्रुवता की वृत्ति हमारे शरीरों में वीर्य का भी रक्षण करनेवाली है।
Subject
ध्रुवता

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