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Atharvaveda - Mantra 10

Atharvaveda 12/3/10

5 Sukta
60 Mantra
12/3/10
Devata- स्वर्गः, ओदनः, अग्निः Rishi- यमः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- स्वर्गौदन सूक्त
Mantra with Swara
उत्त॑रं रा॒ष्ट्रं प्र॒जयो॑त्त॒राव॑द्दि॒शामुदी॑ची कृणवन्नो॒ अग्र॑म्। पाङ्क्तं॒ छन्दः॒ पुरु॑षो बभूव॒ विश्वै॑र्विश्वा॒ङ्गैः स॒ह सं भ॑वेम ॥

उत्त॑रम् । रा॒ष्ट्रम् । प्र॒ऽजया॑ । उ॒त्त॒रऽव॑त् । दि॒शाम् । उदी॑ची । कृ॒ण॒व॒त् । न॒: । अग्र॑म् । पाङ्क्त॑म् । छन्द॑: । पुरु॑ष: । ब॒भू॒व॒ । विश्वै॑ । वि॒श्व॒ऽअ॒ङ्गै: । स॒ह । सम् । भ॒वे॒म॒ ॥३.१०॥

Mantra without Swara
उत्तरं राष्ट्रं प्रजयोत्तरावद्दिशामुदीची कृणवन्नो अग्रम्। पाङ्क्तं छन्दः पुरुषो बभूव विश्वैर्विश्वाङ्गैः सह सं भवेम ॥

उत्तरम् । राष्ट्रम् । प्रऽजया । उत्तरऽवत् । दिशाम् । उदीची । कृणवत् । न: । अग्रम् । पाङ्क्तम् । छन्द: । पुरुष: । बभूव । विश्वै । विश्वऽअङ्गै: । सह । सम् । भवेम ॥३.१०॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (उत्तरं राष्ट्रम्) = एक उत्कृष्ट राष्ट्र (प्रजया उत्तरावत्) = उत्तम प्रजा से अधिक उत्कर्षवाला बनता है। वस्तुत: राष्ट्र-व्यवस्था ठीक होने पर ही राष्ट्र में उत्तम सन्तान होते हैं और वे उत्तम सन्तान राष्ट्र के और अधिक उत्कर्ष का कारण बनते हैं। यह दिशाम् उदीची-दिशाओं में उत्तर दिशा [उत् अञ्च] हमें ऊपर उठने की प्रेरणा देती हुई (नः अग्रं कृण्वत्) = हमारी अग्रगति उन्नति का कारण बने । २. इस उत्कृष्ट राष्ट्र में, उत्तर दिशा से ऊपर उठने की प्रेरणा लेता हुआ (पुरुषः) = पुरुष (पक्तिं छन्दः) = पाँच रूपोंवाला [छन्द् Appearance, look, shape] (बभूव) = होता है। इसके शरीर का निर्माण करनेवाले 'पृथिवी, जल, तेज, वायु व आकाश' रूप पाँचों भूत इसके अनुकूल होते हैं और परिणामत: यह स्वस्थ शरीरवाला होता है। इस शरीर में पञ्चधा विभक्त प्राण [प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान] ठीक कार्य करता है। प्राणशक्ति के ठीक होने से पाँचों कर्मेन्द्रियों व पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ भी अपना-अपना कार्य ठीक प्रकार से करती हैं और 'मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार व हृदय' इन पाँच भागों में विभक्त अन्त:करण भी पवित्र बना रहता है। ये ही इस पक्ति पुरुष के पाँचरूप [छन्द] है। ऐसा होने पर (विश्वैः) = सब तथा (विश्वांगैः सह) = पूर्ण अंगों के साथ हम संभवेम-पुत्ररूप में जन्म लेनेवाले बनें। ('तद्धिजायाया: जायात्वं यदस्यां जायते पुनः') = अपनी जाया में पति ही पुत्ररूप से जन्म लेता है, अत: यदि उसके सब अंग ठीक होंगे तो सन्तान भी तदनुरूप ही होंगे। उत्तम सन्तानों से राष्ट्र उत्तम बनेगा।
Essence
उत्तर दिशा हमें उन्नति की प्रेरणा देती है। स्वयं अपने पाँचों रूपों को ठीक रखते हुए हम उत्कृष्ट प्रजा को जन्म दें, उससे हमारा राष्ट्र और अधिक उन्नत हो।
Subject
उत्तरं राष्ट्र प्रजया उत्तरावत्