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Atharvaveda - Mantra 54

Atharvaveda 12/2/54

5 Sukta
55 Mantra
12/2/54
Devata- अग्निः Rishi- भृगुः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- यक्ष्मारोगनाशन सूक्त
Mantra with Swara
इ॒षीकां॒ जर॑तीमि॒ष्ट्वा ति॒ल्पिञ्जं॒ दण्ड॑नं न॒डम्। तमिन्द्र॑ इ॒ध्मं कृ॒त्वा य॒मस्या॒ग्निं नि॒राद॑धौ ॥

इ॒षीका॑म् । जर॑तीम‌् । इ॒ष्ट्वा । त‍ि॒ल्पिञ्ज॑म् । दण्ड॑नम् । न॒डम् । तम् । इन्द्र॑: । इ॒ध्मम् । कृ॒त्वा । य॒मस्य॑ । अ॒ग्निम् । नि॒:ऽआद॑धौ ॥२.५४॥

Mantra without Swara
इषीकां जरतीमिष्ट्वा तिल्पिञ्जं दण्डनं नडम्। तमिन्द्र इध्मं कृत्वा यमस्याग्निं निरादधौ ॥

इषीकाम् । जरतीम‌् । इष्ट्वा । त‍िल्पिञ्जम् । दण्डनम् । नडम् । तम् । इन्द्र: । इध्मम् । कृत्वा । यमस्य । अग्निम् । नि:ऽआदधौ ॥२.५४॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (जरतीम्) = [जरिता गरिता स्तोता] उस प्रभु का स्तवन करती हुई [सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति, ऋचो अक्षरे परमे व्योमन] (इषीकाम्) = [to urge, impel] कर्तव्य-कर्मों की प्रेरणा देती हुई वेदवाणी को (इष्ट्वा) = अपने साथ संगत करके [यज् संगतिकरणे], तथा (तिल्पिजम्) = [तिल् स्निग्धीभावे, पिजि निकेतने] स्नेह के निकेतन-प्रेमपुञ्ज-प्राणिमात्र के प्रति दयाल, (दण्डनम्) = मार्गभ्रष्ट होने पर दण्ड देनेवाले-न्यायकारी (नडम्) = [नड् गहने] गहन व अचिन्त्यस्वरूप प्रभु को (इष्ट्वा) = पूजकर 'यज देवपूजायाम्' (इन्द्रः) = यह जितेन्द्रिय उपासक (तम्) = उस प्रभु को ही (इध्मं कृत्वा) = दीस बनाकर-प्रभु की उपासना से प्रभु के प्रकाश को देखकर, (यमस्य अग्निं निरादधौ) = यम की अग्नि को अपने से दूर स्थापित करता है, अर्थात् इसे उस नियन्ता प्रभु के दण्ड से दण्डित नहीं होना पड़ता। इसके लिए प्रभु का रूप 'शिव' ही होता है-'रुद्र' रूप नहीं।
Essence
हम वेदवाणी का अध्ययन करें तथा उस 'न्यायकारी, दयालु' प्रभु का स्मरण करें। ऐसा करने पर हमें प्रभु का प्रकाश प्राप्त होगा और हमें मार्गभंश के कारण होनेवाले कष्ट न उठाने पड़ेंगे।
Subject
'तिल्पिञ्जं-दण्डनम् नडम्