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Atharvaveda - Mantra 47

Atharvaveda 12/2/47

5 Sukta
55 Mantra
12/2/47
Devata- अग्निः Rishi- भृगुः Chhanda- पञ्चपदा बार्हतवैराजगर्भा जगती Suktam- यक्ष्मारोगनाशन सूक्त
Mantra with Swara
इ॒ममिन्द्रं॒ वह्निं॒ पप्रि॑म॒न्वार॑भध्वं॒ स वो॒ निर्व॑क्षद्दुरि॒ताद॑व॒द्यात्। तेनाप॑ हत॒ शरु॑मा॒पत॑न्तं॒ तेन॑ रु॒द्रस्य॒ परि॑ पाता॒स्ताम् ॥

इ॒मम् । इन्द्र॑म् । वह्नि॑म् । पप्रि॑म् । अ॒नु॒ऽआर॑भध्वम् । स: । व॒: । नि: । व॒क्ष॒त् । दु॒:ऽइ॒तात्। अ॒व॒द्यात् । तेन॑ । अप॑ । ह॒त॒ । शरु॑म् । आ॒ऽपत॑न्तम् । तेन॑ । रु॒द्रस्य॑ । परि॑ । पा॒त॒ । अ॒स्ताम्॥२.४७॥

Mantra without Swara
इममिन्द्रं वह्निं पप्रिमन्वारभध्वं स वो निर्वक्षद्दुरितादवद्यात्। तेनाप हत शरुमापतन्तं तेन रुद्रस्य परि पातास्ताम् ॥

इमम् । इन्द्रम् । वह्निम् । पप्रिम् । अनुऽआरभध्वम् । स: । व: । नि: । वक्षत् । दु:ऽइतात्। अवद्यात् । तेन । अप । हत । शरुम् । आऽपतन्तम् । तेन । रुद्रस्य । परि । पात । अस्ताम्॥२.४७॥

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Meaning
१.(इमन) = इस (इन्द्रम) = परमैश्वर्यशाली, (वहिम्) = लक्ष्य-स्थान पर पहुँचानेवाले [वह प्रापणे] (पप्रिम्) = सबका पालन व पूरण करनेवाले प्रभु के (अनु) = साथ (आरभध्वम्) = प्रत्येक कार्य का प्रारम्भ करो-प्रभुस्मरणपूर्वक प्रत्येक कार्य को करो। (सः) = वे प्रभु (वः) = तुम्हें (दुरितात्) = दुराचरण से व (अवद्यात) = सब निन्द्य कर्मों से (निर्वक्षत्) = दूर करेंगे। (तेन) = उस प्रभु के साथ, अर्थात् प्रभु की उपासना करते हुए तुमपर (आपतन्तं शरूम्) = गिरता हुआ अस्त्र (अपहत) = दूर नष्ट होता है। (तेन) = उस प्रभु के साथ होते हुए तुम (रुद्रस्य अस्ताम्) = [अस्तां-An arrow] रुद्र से फेंके गये बाण से (परिपात) = चारों ओर से बचाओ। ऐसा प्रयत्न करो कि यह रुद्र का बाण तुमपर न पड़े। प्रभु की उपासना हमें अन्त:शत्रुओं के आक्रमण व आधिदैविक आपत्तियों से बचाएगी।
Essence
प्रभु हमें लक्ष्य-स्थान पर पहुँचानेवाले हैं, वे हमारा पालन व पूरण करनेवाले हैं। प्रभु हमें पापों से बचाते हैं। प्रभु की उपासना हमें आक्रमणकारी शत्रुओं से बचाती है तथा हम प्रभु के क्रोध-पात्र नहीं बनते।

 
Subject
'पप्रि-वह्नि' प्रभु