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Atharvaveda - Mantra 46

Atharvaveda 12/2/46

5 Sukta
55 Mantra
12/2/46
Devata- अग्निः Rishi- भृगुः Chhanda- एकावसाना द्विपदा साम्नी त्रिष्टुप् Suktam- यक्ष्मारोगनाशन सूक्त
Mantra with Swara
सर्वा॑नग्ने॒ सह॑मानः स॒पत्ना॒नैषा॒मूर्जं॑ र॒यिम॒स्मासु॑ धेहि ॥

सर्वा॑न् । अ॒ग्ने॒ । सह॑मान: । स॒ऽपत्ना॑न्। आ । ए॒षा॒म् । ऊर्ज॑म् । र॒यिम् । अ॒स्मासु॑ । धे॒हि॒ ॥२.४६॥

Mantra without Swara
सर्वानग्ने सहमानः सपत्नानैषामूर्जं रयिमस्मासु धेहि ॥

सर्वान् । अग्ने । सहमान: । सऽपत्नान्। आ । एषाम् । ऊर्जम् । रयिम् । अस्मासु । धेहि ॥२.४६॥

Meaning
१. हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो! (एषाम्) = इन अपने भक्तों के (सर्वान् सपत्नन्) = सब शत्रुओं को (सहमान:) = पराभूत करते हुए आप (अस्मासु) = हम उपासकों के जीवनों में ऊर्जम् बल व प्राणशक्ति को तथा (रयिम्) = ऐश्वर्य को (धेहि) = धारण कीजिए। 'काम-वासना' को समास करके आप हमें बल प्राप्त कराइए। 'क्रोध' के विनाश के द्वारा हमारी प्राणशक्ति को सुरक्षित कीजिए तथा 'लोभ' को दूर करके हमें उत्तम ऐश्वर्य प्राप्त कराइए।
Essence
प्रभुकृपा से हम 'काम' पर विजय प्राप्त करके बल-सम्पन्न बनें, क्रोध को जीतकर प्राणशक्ति का रक्षण करें तथा लोभ को परास्त करके उत्तम ऐश्वर्यवाले हों।
Subject
ऊर्जु रयि

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