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Atharvaveda - Mantra 41

Atharvaveda 12/2/41

5 Sukta
55 Mantra
12/2/41
Devata- अग्निः Rishi- भृगुः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- यक्ष्मारोगनाशन सूक्त
Mantra with Swara
ता अ॑ध॒रादुदी॑ची॒राव॑वृत्रन्प्रजान॒तीः प॒थिभि॑र्देव॒यानैः॑। पर्व॑तस्य वृष॒भस्याधि॑ पृ॒ष्ठे नवा॑श्चरन्ति स॒रितः॑ पुरा॒णीः ॥

ता:। अ॒ध॒रात् । उदी॑ची: । आ । अ॒व॒वृ॒त्र॒न् । प्र॒ऽजा॒न॒ती: । प॒थिऽभि॑: । दे॒व॒ऽयानै॑: । पर्व॑तस्य । वृ॒ष॒भस्य॑ । अधि॑ । पृ॒ष्ठे । नवा॑: । च॒र॒न्ति॒ । स॒रित॑: । पु॒रा॒णी: ॥२.४१॥

Mantra without Swara
ता अधरादुदीचीराववृत्रन्प्रजानतीः पथिभिर्देवयानैः। पर्वतस्य वृषभस्याधि पृष्ठे नवाश्चरन्ति सरितः पुराणीः ॥

ता:। अधरात् । उदीची: । आ । अववृत्रन् । प्रऽजानती: । पथिऽभि: । देवऽयानै: । पर्वतस्य । वृषभस्य । अधि । पृष्ठे । नवा: । चरन्ति । सरित: । पुराणी: ॥२.४१॥

Meaning
१. (ता:) = वे (प्रजानती:) = प्रकृष्ट ज्ञानवाली आप्त प्रजाएँ (अधरात) = निम्न मागों को छोड़कर (उदीची:) = उत्कृष्ट मार्गों से गति करनेवाली होती हुई (देवयानैः पथिभिः) = देवयान मार्गों से (आववृत्रन्) = कर्मों में आवर्तनवाली होती हैं। ज्ञानी पुरुष सदा निम्न मार्गों को छोड़कर उत्कृष्ट मागों से चलते हैं। ये आसुरभावों को त्यागकर दैवी प्रवृत्तियों को अपनाते हैं। २. (पर्वतस्य) = पूरण करनेवाले (वृषभस्य) = सुखों के वर्षक प्रभु के (अधिपृष्ठे) = आश्रय में प्रभु की गोद में (पुराणी: सरित:) = क्षीण [Decayed] हुई-हुई नदियाँ फिर से (नवा: चरन्ति) = नवीन होकर गतिवाली होती हैं। जैसे वृष्टिवाले पर्वत पर क्षीण हुई-हुई नदियाँ फिर से जलपूर्ण होकर प्रवाहवाली होती हैं, उसी प्रकार हमारा पूर्ण करनेवाले, सुखों के वर्षक प्रभु के आश्रय में हमारा निम्न स्तर का जीवन पुन: उच्च स्तर का बन जाता है। हम नीचे से ऊपर आ जाते हैं। आसुरमार्ग को छोड़कर दिव्यमार्ग का आश्रय करते हैं।'  
Essence
प्रभु की गोद में हम निम्न मार्ग को छोड़कर उत्कृष्ट मार्ग पर गति करनेवाले बनें। प्रभुस्मरण हमें देवयान में प्रेरित करे। क्षीण हुए-हुए हम फिर से पूर्ण हो जाएँ।
Subject
प्रजानती: [आपः]

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