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Atharvaveda - Mantra 37

Atharvaveda 12/2/37

5 Sukta
55 Mantra
12/2/37
Devata- अग्निः Rishi- भृगुः Chhanda- पुरस्ताद्बृहती Suktam- यक्ष्मारोगनाशन सूक्त
Mantra with Swara
अ॑यज्ञि॒यो ह॒तव॑र्चा भवति॒ नैने॑न ह॒विरत्त॑वे। छि॒नत्ति॑ कृ॒ष्या गोर्धना॒द्यं क्र॒व्याद॑नु॒वर्त॑ते ॥

अ॒य॒ज्ञि॒य: । ह॒तऽव॑र्चा: । भ॒व॒ति॒ । न । ए॒ने॒न॒ । ह॒वि: । अत्त॑वे । छि॒नत्ति॑ । कृ॒ष्या: । गो: । धना॑त् । यम् । क॒व्य॒ऽअत् । अ॒नु॒ऽवर्त॑ते ॥२.३७॥

Mantra without Swara
अयज्ञियो हतवर्चा भवति नैनेन हविरत्तवे। छिनत्ति कृष्या गोर्धनाद्यं क्रव्यादनुवर्तते ॥

अयज्ञिय: । हतऽवर्चा: । भवति । न । एनेन । हवि: । अत्तवे । छिनत्ति । कृष्या: । गो: । धनात् । यम् । कव्यऽअत् । अनुऽवर्तते ॥२.३७॥

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Meaning
१. (क्रव्यात् यं अनुवर्तते) = मांसभक्षक अग्नि जिसका अनुवर्तन करती है, अर्थात् जो मांसभक्षण की प्रवृत्तिवाला बनता है, वह (अयज्ञियः भवति) = यज्ञों की प्रवृत्तिवाला नहीं रहता श्रेष्ठ कर्मों से दूर होकर क्रूर कर्मों को करने में प्रवृत्त हो जाता है। विलास में पड़ा हुआ यह मनुष्य (हतवर्चा:) = नष्ट तेजवाला होता है। (एनेन हवि: अत्तवे न) = इससे दानपूर्वक अदन [हवि] नहीं किया जाता-यह सारे-का-सारा खाने की करता है-अपने ही मुंह में आहुति देनेवाला असुर बन जाता है। २. यह क्रव्याद् अग्नि इस मांसाहारी को (कृष्याः धनात् छिनत्ति) = कृषि से उत्पन्न धन से पृथक्क र देती है। (गोः) [धनात्] = गौवों के पालन से प्राप्त धन से पृथक्क कर देती है। यह कृषि व गो-पालन आदि से दूर होकर सट्टे आदि में प्रवृत्त हो जाता है। अपने विलासमय जीवन के लिए एक रात में ही धनी बनने के स्वप्न देखा करता है।
Essence
मांसाहारी 'अयज्ञिय व हतवर्चा' हो जाता है। यह असुर बन जाता है। इसे कृषि व गोपालन के स्थान में सट्टे का व्यापार प्रिय हो जाता है।
Subject
अयज्ञियः, हतवर्चा: