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Atharvaveda - Mantra 34

Atharvaveda 12/2/34

5 Sukta
55 Mantra
12/2/34
Devata- अग्निः Rishi- भृगुः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- यक्ष्मारोगनाशन सूक्त
Mantra with Swara
अ॑पा॒वृत्य॒ गार्ह॑पत्यात्क्र॒व्यादा॒ प्रेत॑ दक्षि॒णा। प्रि॒यं पि॒तृभ्य॑ आ॒त्मने॑ ब्र॒ह्मभ्यः॑ कृणुता प्रि॒यम् ॥

अ॒प॒ऽआ॒वृत्य॑ । गार्ह॑ऽपत्यात् । क्र॒व्य॒ऽअदा॑ । प्र । इ॒त॒ । द॒क्षि॒णा । प्रि॒यम् । पि॒तृऽभ्य॑: । आ॒त्मने॑ । ब्र॒ह्मऽभ्य॑: । :कृ॒णु॒त॒ । प्रि॒यम् ॥२.३४॥

Mantra without Swara
अपावृत्य गार्हपत्यात्क्रव्यादा प्रेत दक्षिणा। प्रियं पितृभ्य आत्मने ब्रह्मभ्यः कृणुता प्रियम् ॥

अपऽआवृत्य । गार्हऽपत्यात् । क्रव्यऽअदा । प्र । इत । दक्षिणा । प्रियम् । पितृऽभ्य: । आत्मने । ब्रह्मऽभ्य: । :कृणुत । प्रियम् ॥२.३४॥

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Meaning
१. (क्रव्यादा अपावृत्य) = [क्रव्य अद्] मांसभक्षण की प्रवृत्ति से हटकर-कभी मांस-सेवन न करते हुए-(गार्हपत्यात्) = गाईपत्य के हेतु से, अर्थात् घर को उत्तम बनाने के हेतु से, (दक्षिणा प्रेत) = [दक्षिणे सरलोदारौं] सरल व उदार मार्ग से चलो। सरलता व उदारता ही घर को उत्तम बनाएगी, कुटिलता व कृपणता घरों के पतन का हेतु बनती हैं। २. यहाँ तक घर में रहते हुए तुम (पितृभ्यः प्रियं कृणुत) = पितरों के लिए प्रिय कर्म ही करो। (आत्मने) = जो तुम्हें प्रिय लगता हो-वैसा ही दूसरों के साथ करो। (ब्रह्मभ्यः प्रियं) [कृणुत] = ब्रह्मज्ञानियों के लिए जो प्रिय हो वैसा ही करो। पितरों के लिए प्रिय करना ही 'पितृयज्ञ' है। ब्रह्मज्ञानियों का प्रिय करना 'ब्रह्मयज्ञ' व 'अतिथियज्ञ' है। पितयज्ञ व ब्रह्मयज्ञ करनेवाला यह व्यक्ति औरों के साथ वैसा ही वर्तता है, जैसाकि वह औरों से बर्ताव की अपेक्षा करता है।
Essence
मांसभक्षण हमें सरलता व उदारता से दूर ले जाता है और परिणामतः घर को छिन्न-भिन्न कर देता है। हम पितरों के लिए, ब्रह्मज्ञानियों के लिए प्रिय कार्यों को करते हुए औरों के साथ वैसा ही बरतें जैसाकि हम उनसे अपने प्रति बतार्व चाहते हैं।
Subject
सरलता व उदारता