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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 12/2/3

5 Sukta
55 Mantra
12/2/3
Devata- अग्निः Rishi- भृगुः Chhanda- आस्तारपङ्क्तिः Suktam- यक्ष्मारोगनाशन सूक्त
Mantra with Swara
निरि॒तो मृ॒त्युं निरृ॑तिं॒ निररा॑तिमजामसि। यो नो॒ द्वेष्टि॒ तम॑द्ध्यग्ने अक्रव्या॒द्यमु॑ द्वि॒ष्मस्तमु॑ ते॒ प्र सु॑वामसि ॥

नि: । इ॒त: । मृ॒त्युम् । नि:ऽऋ॑तिम् । नि: । अरा॑तिम् । अ॒जा॒म॒सि॒ । य: । न॒: । द्वेष्टि॑ । तम् । अ॒ध्दि॒ । अ॒ग्ने॒ । अ॒क्र॒व्य॒ऽअ॒त् । यम् । ऊं॒ इति॑ । द्वि॒ष्म: । तम् । ऊं॒ इति॑ । ते॒ । प्र । सु॒वा॒म॒सि॒ ॥२.३॥

Mantra without Swara
निरितो मृत्युं निरृतिं निररातिमजामसि। यो नो द्वेष्टि तमद्ध्यग्ने अक्रव्याद्यमु द्विष्मस्तमु ते प्र सुवामसि ॥

नि: । इत: । मृत्युम् । नि:ऽऋतिम् । नि: । अरातिम् । अजामसि । य: । न: । द्वेष्टि । तम् । अध्दि । अग्ने । अक्रव्यऽअत् । यम् । ऊं इति । द्विष्म: । तम् । ऊं इति । ते । प्र । सुवामसि ॥२.३॥

Meaning
१. प्रजापीड़क व्यक्ति 'क्रव्याद् अग्नि' है, तो पीड़कों से रक्षा करनेवाला राजा 'अक्रव्याद् अग्नि' है। राजा से प्रजावर्ग कहता है कि हम (इत:) = यहाँ अपने जीवन से (मृत्युम्) = मृत्यु को रोगों को (निः अजामसि) = निकालकर दूर करते हैं। (ऋतिम्) = [ऋणोति to kill, attack] औरों पर आक्रमण करने व हिंसन की वृत्ति को (नि:) = दूर करते हैं। (अरातिम् नि:) = [अजामसि] अदान व कृपणता की वृत्ति को दूर करते हैं। जो व्यक्ति हम सबके प्रति द्वेष करता है (तम्) = उसे आप (अद्धि) = नष्ट [Destroy] कीजिए। (उ) = और (यं द्विष्म:) = जिस एक को हम सब प्रीति नहीं कर पाते (तम्) = उसको (उ) = निश्चय से (ते प्रसुवामसि) = तेरे प्रति प्रेरित करते हैं।
Essence
राष्ट्र में जब राजा 'अक्रव्याद् अग्नि' होता है-प्रजा को प्रजापीड़कों से रक्षित करता है तब प्रजा 'रोग, हिंसा की वृत्ति तथा कृपणता' से दूर होती है और राजा प्रजाद्वेषियों को उचित दण्ड देनेवाला होता है।
Subject
'मत्य, ऋति व अराति' का निराकरण

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