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Atharvaveda - Mantra 29

Atharvaveda 12/2/29

5 Sukta
55 Mantra
12/2/29
Devata- मृत्युः Rishi- भृगुः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- यक्ष्मारोगनाशन सूक्त
Mantra with Swara
उ॑दी॒चीनैः॑ प॒थिभि॑र्वायु॒मद्भि॑रति॒क्राम॒न्तोऽव॑रा॒न्परे॑भिः। त्रिः स॒प्त कृत्व॒ ऋष॑यः॒ परे॑ता मृ॒त्युं प्रत्यौ॑हन्पद॒योप॑नेन ॥

उ॒दी॒चीनै॑: । प॒थिऽभि॑: । वा॒यु॒मत्ऽभि॑: । अ॒ति॒ऽक्राम॑न्त: । अव॑रान् । परे॑भि: । त्रि: । स॒प्त । कृत्व॑: । ऋष॑य: । परा॑ऽइता । मृ॒त्युम् । प्रति॑ । औ॒ह॒न् । प॒द॒ऽयोप॑नेन ॥२.२९॥

Mantra without Swara
उदीचीनैः पथिभिर्वायुमद्भिरतिक्रामन्तोऽवरान्परेभिः। त्रिः सप्त कृत्व ऋषयः परेता मृत्युं प्रत्यौहन्पदयोपनेन ॥

उदीचीनै: । पथिऽभि: । वायुमत्ऽभि: । अतिऽक्रामन्त: । अवरान् । परेभि: । त्रि: । सप्त । कृत्व: । ऋषय: । पराऽइता । मृत्युम् । प्रति । औहन् । पदऽयोपनेन ॥२.२९॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (उदीचीन:) = उत्कर्ष की ओर ले-जानेवाले [उद् अञ्च], (वायुमद्धिः) = प्राणसाधना से युक्त, जिनमें प्राणायाम आदि का अभ्यास किया जाता है, हम उन (परेभिः पथिभिः) = उत्कृष्ट मागों से (अवरान) = निम्न भोगमागों-राजस्व तामस मार्गों को (अतिक्रामन्त:) = लाँधकर आगे बढ़ते हुए हों। प्रागसाधना के द्वारा हम तमोगुण व रजोगुण से ऊपर उठकर स्वस्थ बने। २. इसप्रकार (ऋषय:) = वासनाओं का संहार करनेवाले [ऋष् to kill] (त्रिः सप्तकृत्वः) = तीन बार 'मन, वाणी व कर्म' के दृष्टिकोण से तथा सात बार 'दो कानों, दो नासिका छिद्रों, दो आँखों व मुख' के दृष्टिकोण से (परेता:) = [पर। इताः] उत्कृष्ट स्थिति को प्राप्त हुए । 'मन, वाणी व कर्म' के दृष्टिकोण से तथा कान आदि सातों होताओं के दृष्टिकोण से पवित्र बनें। इन्होंने पदोपनेन मृत्यु प्रत्यौहन्-मृत्यु के चरणों को विमोहन [to destroy, obliterate, blot out] द्वारा-रोगों के कारणों को दूर करने के द्वारा मृत्यु को अपने से परे विनष्ट किया [उहिर वधे]।
Essence
हम प्राणसाधना करते हुए उत्कृष्ट मार्ग पर चलें। मन, वाणी व कर्म के दृष्टिकोण से तथा सातों 'कर्णी, नासिके, चक्षुषी, मुखम्' के दृष्टिकोण से पवित्र बनते हुए उत्कृष्ट स्थिति को प्राप्त हों। मृत्यु के कारणों को दूर करते हुए दीर्घजीवी बनें।

 
Subject
वायुमद्धिः उदीचीनैः