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Atharvaveda - Mantra 22

Atharvaveda 12/2/22

5 Sukta
55 Mantra
12/2/22
Devata- मृत्युः Rishi- भृगुः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- यक्ष्मारोगनाशन सूक्त
Mantra with Swara
इ॒मे जी॒वा वि मृ॒तैराव॑वृत्र॒न्नभू॑द्भ॒द्रा दे॒वहू॑तिर्नो अ॒द्य। प्राञ्चो॑ अगाम नृ॒तये॒ हसा॑य सु॒वीरा॑सो वि॒दथ॒मा व॑देम ॥

इ॒मे । जी॒वा: । वि । मृ॒तै: । आ । अ॒व॒वृ॒त्र॒न् । अभू॑त् । भ॒द्रा । दे॒वऽहू॑ति: । न॒: । अ॒द्य । प्राञ्च॑: । अ॒गा॒म॒ । नृ॒तये॑ । हसा॑य । सु॒ऽवीरा॑स: । वि॒दथ॑म् । आ । व॒दे॒म॒ ॥२.२२॥

Mantra without Swara
इमे जीवा वि मृतैराववृत्रन्नभूद्भद्रा देवहूतिर्नो अद्य। प्राञ्चो अगाम नृतये हसाय सुवीरासो विदथमा वदेम ॥

इमे । जीवा: । वि । मृतै: । आ । अववृत्रन् । अभूत् । भद्रा । देवऽहूति: । न: । अद्य । प्राञ्च: । अगाम । नृतये । हसाय । सुऽवीरास: । विदथम् । आ । वदेम ॥२.२२॥

Meaning
१. (इमे) = घर में रहनेवाले ये व्यक्ति (जीवा:) = जीवित हों-मुर्दे-से न हों। (ये मृतैः वि आववृत्रन्) = मृत्युओं [रोगों] से पृथक् हों। ये रोगाक्रान्त होकर असमय में ही चले न जाएँ। (न:) = हमारे लिए (अद्य) = आज (देवहूति:) = देवों का आह्वान, अर्थात् देववृत्ति के लोगों का अतिथिरूपेण घर पर आना-जाना (भद्रा अभूत) = कल्याणकर हो। २. उनसे प्रेरणा लेकर (प्राञ्चः अगाम) = हम आगे और आगे बढ़नेवाले हों। (नृतये हसाय) = नाचते व हँसते हुए हम आगे बढ़ते चलें। हम (सुवीरास:) = उत्तम बीर बनते हुए (विदथम् आवदेम) = ज्ञान का ही चर्चण करें। हमारा समय ज्ञान की चर्चाओं में ही उपयुक्त हो।
Essence
हम रोगों से बचकर जीवनशक्ति से परिपूर्ण हों। विद्वानों के सम्पर्क में, उत्तम प्रेरणा को प्राप्त करके आगे बढ़ते चलें। प्रसन्नता से व वीरतापूर्ण जीवन से युक्त होकर हम ज्ञान की ही चर्चा करें।
Subject
भद्रा देवहूतिः

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