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Atharvaveda - Mantra 14

Atharvaveda 12/2/14

5 Sukta
55 Mantra
12/2/14
Devata- अग्निः Rishi- भृगुः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- यक्ष्मारोगनाशन सूक्त
Mantra with Swara
संक॑सुको॒ विक॑सुको निरृ॒थो यश्च॑ निस्व॒रः। ते ते॒ यक्ष्मं॒ सवे॑दसो दू॒राद्दू॒रम॑नीनशन् ॥

सम्ऽक॑सुक: । विऽक॑सुक: । नि॒:ऽऋ॒थ: । य: । च॒ । नि॒ऽस्व॒र: । ते । ते॒ । यक्ष्म॑म् । सऽवे॑दस: । दू॒रात् । दू॒रम् । अ॒नी॒न॒श॒न् ॥२.१४॥

Mantra without Swara
संकसुको विकसुको निरृथो यश्च निस्वरः। ते ते यक्ष्मं सवेदसो दूराद्दूरमनीनशन् ॥

सम्ऽकसुक: । विऽकसुक: । नि:ऽऋथ: । य: । च । निऽस्वर: । ते । ते । यक्ष्मम् । सऽवेदस: । दूरात् । दूरम् । अनीनशन् ॥२.१४॥

Meaning
१. (संकसुक:) = वे प्रभु सारे ब्रह्माण्ड का सम्यक् शासन करनेवाले हैं। (विकसुक:) = विविधरूपों में लोक-लोकान्तरों को गति देनेवाले हैं। (निर्ऋथ:) = पीड़ा का सर्वथा नाश करनेवाले है (च) = और प्रभु वे हैं (य:) = जो (निस्वर:) = उपताप से रहित हैं-अपने उपासकों से उपताप को दूर करनेवाले है। २. प्रभु का उपर्युक्त रूपों में स्मरण करते हुए और स्वयं भी वैसा बनते हुए (ते) = वे (सवेदसः) = ज्ञानी पुरुष [ज्ञान के साथ रहनेवाले पुरुष] (ते यक्ष्मम्) = तेरे राजरोग को (दूरात् दूरम्) = दूर-से दर (अनीनशन्) = नष्ट करें। प्रस्तुत मन्त्र में ब्राह्मण संकसक है-अपना सम्यक शासन करनेवाला। क्षत्रिय 'विकसुक' है-राज्य के सब कार्यों को चलानेवाला-सब विभागों को गति देनेवाला। वैश्य 'निर्ऋथ' है-अन्नादि का सम्यक् उत्पादन करता हुआ यह प्रजा को पीड़ा से बचाता है। शूद्र 'निस्वर' है-बोलता कम है। शोधन आदि द्वारा उपताप को दूर करता है। ये सब अपना अपना कार्य करते हुए, संज्ञान द्वारा राष्ट्र को रोगों से मुक्त रखते हैं।
Essence
प्रभु को 'शासक-गति देनेवाले, पीड़ा व उपताप से दूर ले-जानेवाले' रूप में देखते हुए ज्ञानी पुरुष हमारे रोगों को सुदूर विनष्ट करें। राष्ट्र का उत्तम शासन करते हुए ये लोग राष्ट्र को रोगों से बचाएँ।
Subject
'संकसुक, विकसुक, निर्वथ, निस्वर'

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