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Atharvaveda - Mantra 11

Atharvaveda 12/2/11

5 Sukta
55 Mantra
12/2/11
Devata- अग्निः Rishi- भृगुः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- यक्ष्मारोगनाशन सूक्त
Mantra with Swara
समि॑न्धते॒ संक॑सुकं स्व॒स्तये॑ शु॒द्धा भव॑न्तः॒ शुच॑यः पाव॒काः। जहा॑ति रि॒प्रमत्येन॑ एति॒ समि॑द्धो अ॒ग्निः सु॒पुना॑ पुनाति ॥

सम् । इ॒न्ध॒ते॒ । सम्ऽक॑सुकम् । स्व॒स्तये॑ । शु॒ध्दा: । भव॑न्त: । शुच॑य: । पा॒व॒का: । जहा॑ति । रि॒प्रम् । अति॑ । एन॑: । ए॒ति॒ । सम्ऽइ॑ध्द: । अ॒ग्नि: । सु॒ऽपुना॑ । पु॒ना॒ति॒ ॥२.११॥

Mantra without Swara
समिन्धते संकसुकं स्वस्तये शुद्धा भवन्तः शुचयः पावकाः। जहाति रिप्रमत्येन एति समिद्धो अग्निः सुपुना पुनाति ॥

सम् । इन्धते । सम्ऽकसुकम् । स्वस्तये । शुध्दा: । भवन्त: । शुचय: । पावका: । जहाति । रिप्रम् । अति । एन: । एति । सम्ऽइध्द: । अग्नि: । सुऽपुना । पुनाति ॥२.११॥

Meaning
१. सद्गृहस्थ लोग (स्वस्तये) = कल्याण की प्राप्ति के लिए (संकसुकम्) = उत्तम [सम्यक्] गति देनेवाले उस ब्रह्माण्ड के शासक [कस गतौ शासने च] प्रभु को (समिन्धते) = अपने हृदयदेश में समिद्ध करते हैं। इसप्रकार वे (शुद्धाः भवन्तः) = शुद्ध होते हुए-अपना शोधन करते हुए (शुचय:) = पवित्र मनोवृत्तिवाले बनते हैं। (पावका:) = अपने सम्पर्क में आनेवाले को भी पवित्र करते हैं। २. यह हृदयदेश में प्रभु का दर्शन करनेवाला व्यक्ति (रिप्रम् जहाति) = दोष को त्यागता है। (एन: अति एति) = पाप को लाँघ जाता है। (समिद्धः अग्निः) = हृदयदेश में समिद्ध हुआ-हुआ यह अग्रणी प्रभु (सुपुना) = उत्तम पावन क्रिया से (पुनाति) = हमारे जीवनों को पवित्र कर देते हैं।
Essence
जब हम हदयदेश में प्रभु को समिद्ध करते हैं तब वे प्रभु हमारे जीवनों को पवित्र कर देते हैं। यह प्रभु सम्पर्कवाला व्यक्ति दोषों को त्यागता है-पापों से ऊपर उठता है।
Subject
'संकसुक' अग्नि का दीपन

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