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Atharvaveda - Mantra 10

Atharvaveda 12/2/10

5 Sukta
55 Mantra
12/2/10
Devata- अग्निः Rishi- भृगुः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- यक्ष्मारोगनाशन सूक्त
Mantra with Swara
क्र॒व्याद॑म॒ग्निं श॑शमा॒नमु॒क्थ्यं प्र हि॑णोमि प॒थिभिः॑ पितृ॒याणैः॑। मा दे॑व॒यानैः॒ पुन॒रा गा॒ अत्रै॒वैधि॑ पि॒तृषु॑ जागृहि॒ त्वम् ॥

क्र॒व्य॒ऽअद॑म् । अ॒ग्निम् । श॒श॒मा॒नम् । उ॒क्थ्य᳡म् । प्र । हि॒णो॒मि॒ । प॒थिऽभि॑: । पि॒तृ॒ऽयानै॑: । मा । दे॒व॒ऽयानै॑: । पुन॑: । आ । गा॒: । अत्र॑ । ए॒व । ए॒धि॒ । पि॒तृषु॑ । जा॒गृ॒हि॒ । त्वम् ॥२.१०॥

Mantra without Swara
क्रव्यादमग्निं शशमानमुक्थ्यं प्र हिणोमि पथिभिः पितृयाणैः। मा देवयानैः पुनरा गा अत्रैवैधि पितृषु जागृहि त्वम् ॥

क्रव्यऽअदम् । अग्निम् । शशमानम् । उक्थ्यम् । प्र । हिणोमि । पथिऽभि: । पितृऽयानै: । मा । देवऽयानै: । पुन: । आ । गा: । अत्र । एव । एधि । पितृषु । जागृहि । त्वम् ॥२.१०॥

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Meaning
१. (कव्यादम् अग्निम्) = मांसभक्षक अग्नि को, जोकि (शशमानम्) = [शश् to jump] मर्यादाओं का उल्लंघन करनेवाली है, (उक्थ्यम्) = चाहे वह कितनी भी प्रशंसित हो रही है तो भी, (प्रहिणोमि) = अपने से दूर भेजता हूँ। लोग मांस भोजन की कितनी भी प्रशंसा करें कि 'इससे तो शक्ति बढ़ती है, प्रभु ने इन पशुओं को मनुष्य के लिए ही तो बनाया है, हरिण आदि को न मारा जाएगा तो वे खेतियों को भी तो समाप्त कर डालेंगे' तो भी मैं मांसभोजन में प्रवृत्त नहीं होता। (पितृयाणैः पथिभिः) = पितृयाण-मार्गों पर चलने के हेतु से मैं मांसभोजन से दूर रहता हूँ। मांसभोजन मुझे स्वार्थी व क्रूर बनाकर वृद्ध पितरों की सेवा से भी दूर कर देता है। २. मांसभोजन से दूर रहनेवाले पुरुष से प्रभु कहते हैं कि तू (पुन:) = फिर, गृहस्थ को सुन्दरता से निभाने के बाद, (देवयानैः) = देवयान-मागों से चलता हुआ (मा आगा:) = मुझे प्राप्त हो। गृहस्थ कर्तव्यों की पूर्ति होने तक (अत्र एव एधि) = यहाँ ही हो, अर्थात् संन्यस्त न होकर घर में ही रह और (त्वम् पितषु जागृहि) = पितरों में जागरित रह। उनके प्रति अपने कर्तव्य में प्रमाद न कर।
Essence
मांसभोजन की कितनी भी प्रशंसा की जाए तो भी हम उसमें प्रवृत्त न हों। हम गृहस्थ में रहते हुए स्वकर्तव्य पालन करते हुए पितृयज्ञ को सम्यक्तया पालित करें। गृहस्थ समाप्ति पर देवयान-मार्ग से चलते हुए प्रभु को प्राप्त करें।
Subject
पितृयाण+देवयान