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Atharvaveda - Mantra 57

Atharvaveda 12/1/57

5 Sukta
63 Mantra
12/1/57
Devata- भूमिः Rishi- अथर्वा Chhanda- पुरोऽतिजागता जगती Suktam- भूमि सूक्त
Mantra with Swara
अश्व॑ इव॒ रजो॑ दुधुवे॒ वि ताञ्जना॒न्य आक्षि॑यन्पृथि॒वीं यादजा॑यत। म॒न्द्राग्रेत्व॑री॒ भुव॑नस्य गो॒पा वन॒स्पती॑नां॒ गृभि॒रोष॑धीनाम् ॥

अश्व॑:ऽइव । रज॑: । दु॒धु॒वे॒ । वि । तान् । जना॑न् । ये । आ॒ऽअक्षि॑यन् । पृ॒थि॒वीम् । यात् । आजा॑यत । म॒न्द्रा । अ॒ग्र॒ऽइत्व॑री । भुव॑नस्य । गो॒पा: । वन॒स्पती॑नाम् । गृभि॑: । ओष॑धीनाम् ॥१.५७॥

Mantra without Swara
अश्व इव रजो दुधुवे वि ताञ्जनान्य आक्षियन्पृथिवीं यादजायत। मन्द्राग्रेत्वरी भुवनस्य गोपा वनस्पतीनां गृभिरोषधीनाम् ॥

अश्व:ऽइव । रज: । दुधुवे । वि । तान् । जनान् । ये । आऽअक्षियन् । पृथिवीम् । यात् । आजायत । मन्द्रा । अग्रऽइत्वरी । भुवनस्य । गोपा: । वनस्पतीनाम् । गृभि: । ओषधीनाम् ॥१.५७॥

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Meaning
१. (इव) = जैसे (अश्वः) = घोड़ा (रज: दुधवे) = धूलि को कम्पित करके दूर कर देता है, उसी प्रकार ये जो लोग (पृथिवीं आक्षियन्) = पृथिवी पर समन्तात् बसे हैं, (तान् जनान्) = उन सब मनुष्यों को, (यात् अजायत) = जब से यह पृथिवी हुई है तब से वि [दुधवे] कम्पित करके दूर करती आयी है। इस पृथिवी पर कोई भी प्राणी स्थिर नहीं है। सभी के ये शरीर नश्वर हैं। २. यह पृथिवी (मन्द्रा) = पुराने को समाप्त करके निरन्तर नये को जन्म देती हुई सचमुच प्रशंसनीय [Praisewor thy] है, (अग्र इत्वरी) = आगे और आगे चलनेबाली है, (भुवनस्य गोपा:) = सब लोकों का-अपने पर होनेवाले प्राणियों का रक्षण करनेवाली है। रक्षण के लिए ही सब (वनस्पतीनाम् ओषधीना गभिः) वनस्पतियों व ओषधियों का अपने में ग्रहण करनेवाली है।
Essence
यह पृथिवी पुराने शरीरों को समाप्त करके नयों को जन्म दे रही है। यह प्रशंसनीय पृथिवी निरन्तर आगे चलती हुई सब प्राणियों की रक्षक है-रक्षण के लिए ही सब वनस्पतियों को अपने में धारण किये हुए है।
Subject
नित्य नव सर्जन