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Atharvaveda - Mantra 53

Atharvaveda 12/1/53

5 Sukta
63 Mantra
12/1/53
Devata- भूमिः Rishi- अथर्वा Chhanda- पुरोबार्हतानुष्टुप् Suktam- भूमि सूक्त
Mantra with Swara
द्यौश्च॑ म इ॒दं पृ॑थि॒वी चा॒न्तरि॑क्षं च मे॒ व्यचः॑। अ॒ग्निः सूर्य॒ आपो॑ मे॒धां विश्वे॑ दे॒वाश्च॒ सं द॑दुः ॥

द्यौ: । च॒ । मे॒ । इ॒दम् । पृ॒थि॒वी । च॒ । अ॒न्तरि॑क्षम् । च॒ । मे॒ । व्यच॑: । अ॒ग्नि: । सूर्य॑: । आप॑: । मे॒धाम् । विश्वे॑ । दे॒वा: । च॒ । सम् । द॒दु॒: ॥१.५३॥

Mantra without Swara
द्यौश्च म इदं पृथिवी चान्तरिक्षं च मे व्यचः। अग्निः सूर्य आपो मेधां विश्वे देवाश्च सं ददुः ॥

द्यौ: । च । मे । इदम् । पृथिवी । च । अन्तरिक्षम् । च । मे । व्यच: । अग्नि: । सूर्य: । आप: । मेधाम् । विश्वे । देवा: । च । सम् । ददु: ॥१.५३॥

Meaning
१. (द्यौः च) = द्युलोक, (पृथिवी च) = पृथिवीलोक, (अन्तरिक्षं च) = और अन्तरिक्षलोक (मे) = मेरे लिए (इदं व्यच:) = इस विशालता-विशाल हृदयता [Expanse, Vastness] को दें। द्युलोकस्थ सूर्य सभी के लिए प्रकाश देता है, पृथिवी से उत्पन्न फूल-फल सभी भद्र-पापियों का पोषण करते हैं, अन्तरिक्ष में बहनेवाला वायु सभी को जीवन देता है। मेरे हृदय में भी सभी के लिए स्थान हो। २. (अग्निः) = पृथिवी का मुख्यदेव 'अग्नि', (सूर्यः) = द्युलोक का मुख्य देव 'सूर्य', (आप:) = अन्तरिक्ष में मेघस्थ जल, (विश्वेदेवा: च) = और सब देव मिलकर मुझे (मेधा संददुः) = बुद्धि देनेवाले हों। सभी देवों की अनुकूलता में मैं स्वस्थ मस्तिष्क बनें। सब देवों की अनुकूलता होने पर ही स्वास्थ्य प्राप्त होता और बुद्धि भी स्वस्थ बनी रहती है।
Essence
त्रिलोकी के विस्तार का चिन्तन मुझे भी विशाल बनाये। सूर्य आदि सब देव मुझे स्वस्थ बनाते हुए स्वस्थ मस्तिष्कवाला करें।
Subject
व्यचः-मेधा

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