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Atharvaveda - Mantra 44

Atharvaveda 12/1/44

5 Sukta
63 Mantra
12/1/44
Devata- भूमिः Rishi- अथर्वा Chhanda- जगती Suktam- भूमि सूक्त
Mantra with Swara
नि॒धिं बिभ्र॑ती बहु॒धा गुहा॒ वसु॑ म॒णिं हिर॑ण्यं पृथि॒वी द॑दातु मे। वसू॑नि नो वसु॒दा रास॑माना दे॒वी द॑धातु सुमन॒स्यमा॑ना ॥

नि॒ऽधिम् । बिभ्र॑ती । ब॒हु॒ऽधा । गुहा॑ । वसु॑ । म॒णिम् । हिर॑ण्यम् । पृ॒थि॒वी । द॒दा॒तु॒ । मे॒ । वसू॑नि । न॒: । व॒सु॒ऽदा: । रास॑माना । दे॒वी । द॒धा॒तु॒ । सु॒ऽम॒न॒स्यमा॑ना ॥१.४४॥

Mantra without Swara
निधिं बिभ्रती बहुधा गुहा वसु मणिं हिरण्यं पृथिवी ददातु मे। वसूनि नो वसुदा रासमाना देवी दधातु सुमनस्यमाना ॥

निऽधिम् । बिभ्रती । बहुऽधा । गुहा । वसु । मणिम् । हिरण्यम् । पृथिवी । ददातु । मे । वसूनि । न: । वसुऽदा: । रासमाना । देवी । दधातु । सुऽमनस्यमाना ॥१.४४॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (गुहा) = अपनी गुहाओं में (बहुधा निधिं बिभ्रती) = विविध कोशों को धारण करती हुई (पृथिवी) = यह भूमि (मे) = मेरे लिए (वसु) = धन को (मणिम्) = वैदूर्य आदि मणियों को तथा (हिरण्यम्) = सुवर्ण को (ददातु) = दे। २. यह (वसुदा:) = धनों को देनेवाली (देवी) = दिव्यगुणयुक्त पृथिवी (रासमाना) = वसुओं को देती हुई, (सुमनस्यामाना) = हमारे मन का उत्तम साधन बनती हुई (वसूनि दधातु) = वसुओं को हमारे लिए दे। यह भूमिमाता हमारे लिए वसुओं का धारण करे।

 
Essence
यह पृथिवी वसुधा है। यह हमारे लिए वसुदा हो। वसुओं को प्राप्त करके हम सौमनस्यवाले हों।
Subject
वसुदा, वसुधा