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Atharvaveda - Mantra 38

Atharvaveda 12/1/38

5 Sukta
63 Mantra
12/1/38
Devata- भूमिः Rishi- अथर्वा Chhanda- त्र्यवसाना षट्पदा जगती Suktam- भूमि सूक्त
Mantra with Swara
यस्यां॑ सदोहविर्धा॒ने यूपो॒ यस्यां॑ निमी॒यते॑। ब्र॒ह्माणो॒ यस्या॒मर्च॑न्त्यृ॒ग्भिः साम्ना॑ यजु॒र्विदः॑। यु॒ज्यन्ते॒ यस्या॑मृ॒त्विजः॒ सोम॒मिन्द्रा॑य॒ पात॑वे ॥

यस्या॑म् । स॒दा॒ह॒वि॒र्धा॒ने इति॑ स॒द॒:ऽह॒वि॒र्धा॒ने । यूप॑: । यस्या॑म् । नि॒ऽमी॒यते॑ । ब्र॒ह्माण॑: । यस्या॑म् । अर्च॑न्ति । ऋ॒क्ऽभि: । साम्ना॑ । य॒जु॒:ऽविद॑: । यु॒ज्यन्ते॑ । यस्या॑म् । ऋ॒त्विज॑: । सोम॑म् । इन्द्रा॑य । पात॑वे ॥१.३८॥

Mantra without Swara
यस्यां सदोहविर्धाने यूपो यस्यां निमीयते। ब्रह्माणो यस्यामर्चन्त्यृग्भिः साम्ना यजुर्विदः। युज्यन्ते यस्यामृत्विजः सोममिन्द्राय पातवे ॥

यस्याम् । सदाहविर्धाने इति सद:ऽहविर्धाने । यूप: । यस्याम् । निऽमीयते । ब्रह्माण: । यस्याम् । अर्चन्ति । ऋक्ऽभि: । साम्ना । यजु:ऽविद: । युज्यन्ते । यस्याम् । ऋत्विज: । सोमम् । इन्द्राय । पातवे ॥१.३८॥

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Meaning
१. (यस्याम्) = जिस भूमि पर (सदोहविर्धाने) = सभामण्डप व यज्ञस्थलियाँ बनायी जाती हैं, (यस्याम्) = जिसपर (यूप:) = यज्ञस्तम्भ (निमीयते) = निश्चित मानपूर्वक बनाया जाता है। (यस्याम्) = जिसपर (ब्रह्माण:) = वेदज्ञ (विद्वान् ऋग्भिः) = ऋचाओं के द्वारा तथा (साम्ना) = साममन्त्रों के द्वारा (अर्चन्ति) = प्रभु का अर्चन करते हैं 'ऋग्भिः 'विज्ञान का संकेत करता है तथा 'साम्ना' श्रद्धा का। प्रभु का उपासन विज्ञान व श्रद्धा के समन्वय से ही होता है। २. (यस्याम्) = जिस पृथिवी पर (यजुर्विदः) = यजुर्मन्त्रों के ज्ञाता (ऋत्विज:) = ऋतु के अनुसार यज्ञ करनेवाले लोग (युज्यन्ते) = अपने यज्ञादि कर्मों में युक्त होते हैं तथा (सोमं पातवे) = शरीर में सोम के पान के लिए (इन्द्राय) = परमैश्वर्यशाली, शत्रुविद्रावक प्रभु के लिए (युज्यन्ते) = योग में प्रवृत्त होते हैं। प्रभु का स्मरण वासनाविनाश के द्वारा हमें सोमपान के योग्य बनाता है।
Essence
एक आदर्श राष्ट्र में सभामण्डप व यज्ञस्थलियाँ होती हैं। यहाँ यज्ञस्तम्भों का निर्माण होकर ऋत्विजों द्वारा यज्ञ किये जाते हैं, ज्ञानियों द्वारा प्रभु का अर्चन होता है तथा शरीर में सोमरक्षण के लिए शत्रुविद्रावक प्रभु से चित्तवृत्ति का सम्पर्क बनाया जाता है।
Subject
आदर्श भूमि