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Atharvaveda - Mantra 20

Atharvaveda 12/1/20

5 Sukta
63 Mantra
12/1/20
Devata- भूमिः Rishi- अथर्वा Chhanda- विराडुरोबृहती Suktam- भूमि सूक्त
Mantra with Swara
अ॒ग्निर्दि॒व आ त॑पत्य॒ग्नेर्दे॒वस्यो॒र्वन्तरि॑क्षम्। अ॒ग्निं मर्ता॑स इन्धते हव्य॒वाहं॑ घृत॒प्रिय॑म् ॥

अ॒ग्नि: । दि॒व: । आ । त॒प॒ति॒ । अ॒ग्ने: । दे॒वस्य॑ । उ॒रु । अ॒न्तरि॑क्षम् । अ॒ग्निम् । मर्ता॑स: । इ॒न्ध॒ते॒ । ह॒व्य॒ऽवाह॑म् । ह॒व्य॒ ऽवाह॑म् । घृ॒त॒ऽप्रिय॑म् ॥१.२०॥

Mantra without Swara
अग्निर्दिव आ तपत्यग्नेर्देवस्योर्वन्तरिक्षम्। अग्निं मर्तास इन्धते हव्यवाहं घृतप्रियम् ॥

अग्नि: । दिव: । आ । तपति । अग्ने: । देवस्य । उरु । अन्तरिक्षम् । अग्निम् । मर्तास: । इन्धते । हव्यऽवाहम् । हव्य ऽवाहम् । घृतऽप्रियम् ॥१.२०॥

Meaning
१. (दिवः) = लोक से यह (अग्निः आतपति) = सूर्यरूप अग्नि समन्तात् दोस हो रहा है। (देवस्य अग्नेः) = प्रकाशमय विद्युद्प अग्नि का ही यह (उरु अन्तरिक्षम्) = विशाल अन्तरिक्ष है। (मास:) = इस पृथिवी पर स्थित मनुष्य उस (अग्निं इन्धते) = अग्नि को दीस करते हैं, जोकि (हव्यवाहम) = हव्य पदार्थों का वहन करता है और (घृतप्रियम्) = घृत के द्वारा प्रीणित होनेवाला है, अर्थात् मनुष्य यहाँ यज्ञाग्नि को दीप्त करते हैं।
Essence
यह अग्नि द्युलोक में सूर्यरूप से है, अन्तरिक्ष में विधुदूप से तथा इस पृथिवी पर यज्ञाग्नि के रूप में मनुष्यों से दीप्त किया जाता है।
Subject
त्रिलोकी में 'अग्नि'

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