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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 12/1/2

5 Sukta
63 Mantra
12/1/2
Devata- भूमिः Rishi- अथर्वा Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Suktam- भूमि सूक्त
Mantra with Swara
अ॑संबा॒धं ब॑ध्य॒तो मा॑न॒वानां॒ यस्या॑ उ॒द्वतः॑ प्र॒वतः॑ स॒मं ब॒हु। नाना॑वीर्या॒ ओष॑धी॒र्या बिभ॑र्ति पृथि॒वी नः॑ प्रथतां॒ राध्य॑तां नः ॥

अ॒स॒म्ऽबा॒धम् । म॒ध्य॒त: । मा॒न॒वाना॑म् । यस्या॑: । उ॒त्ऽवत॑: । प्र॒ऽवत॑: । स॒मम् । ब॒हु । नाना॑ऽवीर्या: । ओष॑धी: । या । बिभ॑र्ति । पृ॒थि॒वी । न॒: । प्र॒थ॒ता॒म् । राध्य॑ताम् । न॒: ॥१.२॥

Mantra without Swara
असंबाधं बध्यतो मानवानां यस्या उद्वतः प्रवतः समं बहु। नानावीर्या ओषधीर्या बिभर्ति पृथिवी नः प्रथतां राध्यतां नः ॥

असम्ऽबाधम् । मध्यत: । मानवानाम् । यस्या: । उत्ऽवत: । प्रऽवत: । समम् । बहु । नानाऽवीर्या: । ओषधी: । या । बिभर्ति । पृथिवी । न: । प्रथताम् । राध्यताम् । न: ॥१.२॥

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Meaning
१. पृथिवी 'पृथिवी' है-सचमुच पर्याप्त विस्तारवाली है। यह अपनी गोद में मानवों के लिए पर्याप्त स्थान रखती है। उनके परस्पर सम्बाध-टकराने की यहाँ आवश्कता ही नहीं। सामान्यतः एक देश व दूसरे देश के मध्य में पर्वत व नदी, सिन्धु आदि की इसप्रकार की एक स्वाभाविक सीमा-सी बनी हुई है कि एक-दूसरे से लड़ने की सुविधा व सम्भावना ही कम हो जाती है। इसप्रकार (मानवानाम्) = मनुष्यों के (असम्बाधम् मध्यत:) = परस्पर न टकराने की व्यवस्था करती हुई, (यस्या:) = जिस पृथिवी के (उद्वतः) = [Height, elevatives, declivity, precipice] उच्चस्थल, (प्रवत:) = [Declivity, precipice] ढलान व (समम्) = समस्थल (बहु) = बहुत हैं। (या) = जो प्रथिवी (नानावीर्यः) = विविध शक्तियोंवाली (ओषधीः) = ओषधियों को (बिभर्ति) = धारण करती है, वह पृथिवी (नः प्रथताम्) = हमारी शक्तियों का विस्तार करे और (नः राध्यताम्) = हमारे लिए कार्यों में सिद्धि को प्राप्त करानेवाली हो।
Essence
पृथिवी विशाल है-समझदार व्यक्त्यिों को यहाँ परस्पर टकराने [सम्बाध] को आवश्यकता नहीं। पृथिवी के उच्चस्थल, ढलान व समस्थल बहुत हैं। वे भिन्न-भिन्न स्वभाववाले व्यक्तियों के रहने के लिए पर्याप्त हैं। यह पृथिवी विविध ओषधियों को जन्म देती हुई हमें शक्ति सम्पन्न बनाती है और सफल करती है।
Subject
पथिवी माता की विशाल गोद