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Atharvaveda - Mantra 10

Atharvaveda 12/1/10

5 Sukta
63 Mantra
12/1/10
Devata- भूमिः Rishi- अथर्वा Chhanda- त्र्यवसाना षट्पदा जगती Suktam- भूमि सूक्त
Mantra with Swara
याम॒श्विना॒वमि॑मातां॒ विष्णु॒र्यस्यां॑ विचक्र॒मे। इन्द्रो॒ यां च॒क्र आ॒त्मने॑ऽनमि॒त्रां शची॒पतिः॑। सा नो॒ भूमि॒र्वि सृ॑जतां मा॒ता पु॒त्राय॑ मे॒ पयः॑ ॥

याम् । अ॒श्विनौ॑ । अमि॑माताम् । विष्णु॑: । यस्या॑म् । वि॒ऽच॒क्र॒मे । इन्द्र॑: । याम् । च॒क्रे । आ॒त्मने॑ । अ॒न॒मि॒त्राम् । शची॒ऽपति॑: । सा । न॒: । भूमि॑: । वि । सृ॒ज॒ता॒म् । मा॒ता । पु॒त्राय॑ । मे॒ । पय॑: ॥१.१०॥

Mantra without Swara
यामश्विनावमिमातां विष्णुर्यस्यां विचक्रमे। इन्द्रो यां चक्र आत्मनेऽनमित्रां शचीपतिः। सा नो भूमिर्वि सृजतां माता पुत्राय मे पयः ॥

याम् । अश्विनौ । अमिमाताम् । विष्णु: । यस्याम् । विऽचक्रमे । इन्द्र: । याम् । चक्रे । आत्मने । अनमित्राम् । शचीऽपति: । सा । न: । भूमि: । वि । सृजताम् । माता । पुत्राय । मे । पय: ॥१.१०॥

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Meaning
१. (याम्) = जिस पृथिवी को (अश्विनौ) = सूर्य व चन्द्र (अमिमाताम्) = मापने में लगे है-पूर्व से पश्चिम की ओर जाते हुए सूर्य व चन्द्र मानो पृथिवी को माप ही रहे हैं। (यस्याम्) = जिस पृथिवी पर (विष्णुः) = [आदित्यानामहं विष्णुः] सर्वाधिक देदीप्यमान विष्णु नामक आदित्य (विचक्रमे) = विशिष्ट गतिवाला व पुरुषार्थवाला होता है। अथवा (विष्णुः) =  सर्वव्यापक प्रभु (यस्याम्) = जिस प्रथिवी पर विचक्रमे विविध सृष्टि [पदार्थों] को उत्पन्न करता है। २. (याम्) = जिस भूमि को (इन्द्र:) = जितेन्द्रिय, (शचीपतिः) = शक्ति व प्रज्ञान का स्वामी पुरुष (आत्मने) = अपने लिए (अनमित्राम्) = शत्ररहित (चक्रे) = करता है। जितेन्द्रिय बनकर, शक्ति व प्रज्ञान के साथ विचरने पर, यहाँ कोई भी पदार्थ हमारे लिए हानिकर नहीं होता। (सा न: भूमि:) = वह हमारी भूमिमाता मे मेरे लिए (पयः विसृजताम्) = दूध दे, जैसेकि (माता पुत्राय) = माता पुत्र के लिए दुग्ध देती है।
Essence
सूर्य और चन्द्र से इस पृथिवी का मानो मापन हो रहा है। इन सूर्य-चन्द्र के द्वारा सर्वव्यापक प्रभु पृथिवी पर विविध वनस्पतियों को जन्म दे रहे हैं। यह पृथिवी शक्ति व प्रज्ञान के स्वामी जितेन्द्रिय पुरुष की मित्र है। यह भूमि हम पुत्रों के लिए आप्यायन के साधनभूत दुग्ध आदि पदार्थों को दे।
Subject
शचीपति इन्द्र