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Atharvaveda - Mantra 30

Atharvaveda 11/8/30

10 Sukta
34 Mantra
11/8/30
Devata- अध्यात्मम्, मन्युः Rishi- कौरुपथिः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- अध्यात्म सूक्त
Mantra with Swara
या आपो॒ याश्च॑ दे॒वता॒ या वि॒राड्ब्रह्म॑णा स॒ह। शरी॑रं॒ ब्रह्म॒ प्रावि॑श॒च्छरी॒रेऽधि॑ प्र॒जाप॑तिः ॥

या: । आप॑: । या: । च॒ । दे॒वता॑: । या । वि॒ऽराट् । ब्रह्म॑णा । स॒ह । शरी॑रम् । ब्रह्म॑ । प्र । अ॒वि॒श॒त् । शरी॑रे । अधि॑ । प्र॒जाऽप॑ति: ॥१०.३०॥

Mantra without Swara
या आपो याश्च देवता या विराड्ब्रह्मणा सह। शरीरं ब्रह्म प्राविशच्छरीरेऽधि प्रजापतिः ॥

या: । आप: । या: । च । देवता: । या । विऽराट् । ब्रह्मणा । सह । शरीरम् । ब्रह्म । प्र । अविशत् । शरीरे । अधि । प्रजाऽपति: ॥१०.३०॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (या: आप:) = जो 'आस्नेयी वास्तेयी' आदि जल हैं [११।८।२८], (याः च देवता:) = जो इन्द्रियों के अधिष्ठातृदेव सूर्य आदि हैं, और (या विराट्) = जो प्रभु की विशिष्ट शक्ति हैं, वे (ब्रह्मणा सह) = ब्रह्म के साथ (शरीरं प्राविशत्) = शरीर में प्रविष्ट होती हैं। इस शरीर में ब्रह्म [प्राविशत्]-प्रभु का प्रवेश होता है। वही सबका अन्तर्यामी है। शरीरे (अधि प्रजापतिः) = इस शरीर में प्रजाओं का पालक [पुत्राधुत्पादक] जीव रहता है। यह जीव के विविध भोगों का स्थान बनता है।
Essence
शरीर में अपनी प्रकृतिरूप शक्ति के साथ ब्रा का भी निवास है-वे प्रभु तो अन्तर्यामिरूप से यहाँ रह ही रहे हैं। शरीर में भोगों को भोगनेवाला जीव भी प्रजापति बनकर रह रहा है।
Subject
विराट् ब्रह्मणा सह