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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 11/8/1

10 Sukta
34 Mantra
11/8/1
Devata- अध्यात्मम्, मन्युः Rishi- कौरुपथिः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- अध्यात्म सूक्त
Mantra with Swara
यन्म॒न्युर्जा॒यामाव॑हत्संक॒ल्पस्य॑ गृ॒हादधि॑। क आ॑सं॒ जन्याः॒ के व॒राः क उ॑ ज्येष्ठव॒रोभ॑वत् ॥

यत् । म॒न्यु: । जा॒याम् । आ॒ऽअव॑हत् । स॒म्ऽक॒ल्पस्य॑ । गृ॒हात् । अधि॑ । के । आ॒स॒न् । जन्या॑: । के । व॒रा: । क: । ऊं॒ इति॑ । ज्ये॒ष्ठ॒ऽव॒र: । अ॒भ॒व॒त् ॥१०.१॥

Mantra without Swara
यन्मन्युर्जायामावहत्संकल्पस्य गृहादधि। क आसं जन्याः के वराः क उ ज्येष्ठवरोभवत् ॥

यत् । मन्यु: । जायाम् । आऽअवहत् । सम्ऽकल्पस्य । गृहात् । अधि । के । आसन् । जन्या: । के । वरा: । क: । ऊं इति । ज्येष्ठऽवर: । अभवत् ॥१०.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. स्वमहिम प्रतिष्ठ परब्रह्म की और सत्त्वरजस्तमोगुणात्मिका मायाशक्ति [प्रकृति] की कर्मपरिपाक जनित सम्बन्ध के कारण उत्पन्न होनेवाली जो परमेश्वर-सम्बन्धी सिसृक्षावस्था है, उसी का यहाँ लौकिक विवाह के रूप में निरूपण करते हैं। (यत्) = जब (मन्युः) = [मन्यते सर्व जानाति-सा०] सर्वज्ञ प्रभु (जायाम् आवहत्) = [जायते अस्या सर्व जगत्-सा०] सिसूक्षाबस्थापन्न पारमेश्वरी मायाशक्ति को भार्यारूप से स्वीकार करनेवाला हुआ तो वह इस जाया को (संकल्पस्य गृहात् अधि) = [सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय-तै० आ०८।६।१] संकल्प के घर से लाया। संकल्प से ही इस सिसृक्षावस्थारूप जाया की उत्पत्ति हुई। २. उस समय उस जाया के आवहन के प्रसंग में (के जन्याः असन्) = कौन जायापक्ष के लोग थे। (के वरा:) = कौन वरपक्ष के लोग थे। (च) = और (क:) = कौन (ज्येष्ठवर: अभवत्) = विवाह करनेवाला प्रधानभूत वर हुआ।
Essence
प्रभु के संकल्प से सिसृक्षावस्था की उत्पत्ति हुई। इसके होने पर ही प्रभु ने इस विविध सृष्टि को प्रादुर्भूत किया।
Subject
मन्यु का जाया आवहन