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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 11/7/4

10 Sukta
27 Mantra
11/7/4
Devata- उच्छिष्टः, अध्यात्मम् Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- उच्छिष्ट ब्रह्म सूक्त
Mantra with Swara
दृ॒ढो दृं॑हस्थि॒रो न्यो ब्रह्म॑ विश्व॒सृजो॒ दश॑। नाभि॑मिव स॒र्वत॑श्च॒क्रमुच्छि॑ष्टे दे॒वताः॑ श्रि॒ताः ॥

दृ॒ढ: । दृं॒ह॒ऽस्थि॒र: । न्य: । ब्रह्म॑ । वि॒श्व॒ऽसृज॑: । दश॑ । नाभि॑म्ऽइव । स॒र्वत॑: । च॒क्रम् । उत्ऽशि॑ष्टे । दे॒वता॑: । श्रि॒ता: ॥९.४॥

Mantra without Swara
दृढो दृंहस्थिरो न्यो ब्रह्म विश्वसृजो दश। नाभिमिव सर्वतश्चक्रमुच्छिष्टे देवताः श्रिताः ॥

दृढ: । दृंहऽस्थिर: । न्य: । ब्रह्म । विश्वऽसृज: । दश । नाभिम्ऽइव । सर्वत: । चक्रम् । उत्ऽशिष्टे । देवता: । श्रिता: ॥९.४॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (दृढः) = दृढ़ अंगोंवाला-प्रवृद्ध शरीरवाला देव, (दृंहस्थिर:) = दूंहण के द्वारा स्थिर किया हुआ यह लोक, (न्य:) = [नेतारस्तत्रत्याः प्राणिन:-सा०] उन लोकों में रहनेवाले प्राणी, (ब्रह्म) = बढ़ा हुआ जगत् का कारण अव्यक्तात्मक [महत्तत्त्व], (दश विश्वसृज:) = नौ प्राणों के साथ मुख्य प्राण ये प्राण तो विश्व के स्रष्टा है-तथा (देवता:) = सब देव (उच्छिष्टे) = उस उच्छिष्ट प्रभु में इसप्रकार (श्रिता:) = आश्रित है, (इव) = जैसे (नाभिम्) = नाभि को (सर्वत:) = सब ओर से आवेष्टित करके (चक्रम्) = रथचक्र स्थित होता है।
Essence
सब दृढ देव, दृढ़ता से स्थिर किया हुआ लोक, उन लोकों में गति करनेवाले प्राणी, दश प्राण व सब देव प्रभु में इसप्रकार आश्रित हैं, जैसे नाभि में रथचक्र।

 
Subject
उच्छिष्टे देवताः श्रिताः