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Atharvaveda - Mantra 15

Atharvaveda 11/7/15

10 Sukta
27 Mantra
11/7/15
Devata- उच्छिष्टः, अध्यात्मम् Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- उच्छिष्ट ब्रह्म सूक्त
Mantra with Swara
उ॑प॒हव्यं॑ विषू॒वन्तं॒ ये च॑ य॒ज्ञा गुहा॑ हि॒ताः। बिभ॑र्ति भ॒र्ता विश्व॒स्योच्छि॑ष्टो जनि॒तुः पि॒ता ॥

उ॒प॒ऽहव्य॑म् । वि॒षु॒ऽवन्त॑म् । ये । च॒ । य॒ज्ञा: । गुहा॑ । हि॒ता: । बिभ॑र्ति । भ॒र्ता । विश्व॑स्य । उत्ऽशि॑ष्ट: । ज॒नि॒तु: । पि॒ता ॥९.१५॥

Mantra without Swara
उपहव्यं विषूवन्तं ये च यज्ञा गुहा हिताः। बिभर्ति भर्ता विश्वस्योच्छिष्टो जनितुः पिता ॥

उपऽहव्यम् । विषुऽवन्तम् । ये । च । यज्ञा: । गुहा । हिता: । बिभर्ति । भर्ता । विश्वस्य । उत्ऽशिष्ट: । जनितु: । पिता ॥९.१५॥

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Meaning
१. (उपहव्यम्) = उपहव्य नामक सोमयाग को, (विषूवन्तम्) = गवामयन नामक संवत्सर सत्र के मासषट्कात्मक पूर्वोत्तर पक्षों के मध्य में एकविंशस्तोमक अनुष्ठेय सोमयाग को, (ये च) = और जो अन्य (यज्ञाः गुहा हिता:) = यज्ञ गुहा में निगूढ हैं-अज्ञायमान से है-विद्वानों की बुद्धिरूप गुहा में हैं-उन सब यज्ञों को यह (उच्छिष्ट:) = उच्छिष्यमाण परमात्मा (बिभर्ति) = धारण करता है। जो प्रभु (विश्वस्य भर्ताः) = सम्पूर्ण जगत् का भरण करनेवाले हैं, (जनितुः पिता) = जनयिता पिताओं के भी पिता हैं। सब जनयिता प्रभु से उत्पन्न होकर ही जनक बनते हैं।
Essence
प्रभु ही सब यज्ञों के धारक हैं। प्रभु विश्व के भर्ती हैं, जनकों के भी जनक हैं।
Subject
सब यज्ञों का धारक'प्रभु'