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Atharvaveda - Mantra 10

Atharvaveda 11/7/10

10 Sukta
27 Mantra
11/7/10
Devata- उच्छिष्टः, अध्यात्मम् Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- उच्छिष्ट ब्रह्म सूक्त
Mantra with Swara
ए॑करा॒त्रो द्वि॑रा॒त्रः स॑द्यः॒क्रीः प्र॒क्रीरु॒क्थ्यः। ओतं॒ निहि॑त॒मुच्छि॑ष्टे य॒ज्ञस्या॒णूनि॑ वि॒द्यया॑ ॥

ए॒क॒ऽरा॒त्र: । द्वि॒ऽरा॒त्र: । स॒द्य॒:ऽक्री: । प्र॒ऽक्री: । उ॒क्थ्या᳡: । आऽउ॑तम् । निऽहि॑तम् । उत्ऽशि॑ष्टे । य॒ज्ञस्य॑ । अ॒णूनि॑ । वि॒द्यया॑ ॥९.१०॥

Mantra without Swara
एकरात्रो द्विरात्रः सद्यःक्रीः प्रक्रीरुक्थ्यः। ओतं निहितमुच्छिष्टे यज्ञस्याणूनि विद्यया ॥

एकऽरात्र: । द्विऽरात्र: । सद्य:ऽक्री: । प्रऽक्री: । उक्थ्या: । आऽउतम् । निऽहितम् । उत्ऽशिष्टे । यज्ञस्य । अणूनि । विद्यया ॥९.१०॥

Meaning
१. (एकरात्र:) = [एक रात्रि व्याप्य वर्तमान: सोमयाग: "एकरात्र'] एक रात्रि तक चलनेवाला सोमयाग, (द्विरात्र:) = दो रात्रियों तक चलनेवाला सोमयाग, (सद्यः क्री:) = [सद्यः तदानीमेव क्रीयते सोमोऽस्मिन् इति] जिसमें उसी समय सोम का क्रय होता है, वह सोमयाग तथा (प्रक्री:) = प्रकर्षण सोमक्रयवाला सोमयाग (उक्थ्य:) = अग्निष्टोम के बाद होनेवाले तीन स्तुतशस्त्र जिसमें उक्थसंज्ञक हैं, वह सोमयाग-ये सब (उच्छिष्टे) = उच्छिष्यमाण प्रभु में (ओतम्) = आबद्ध हैं और (निहितम्) = निक्षिप्त [रक्खे हुए] हैं। इसप्रकार (यज्ञस्य) = यज्ञ-सम्बन्धी (अणूनि) = सूक्ष्मरूप (विद्यया) = ज्ञान के साथ उस ब्रह्म में ही आश्रित हैं।
Essence
एकरात्र, द्विरात्र' आदि सोमयागों का उपदेश प्रभु ही देते हैं। सब यज्ञों के सूक्ष्मरूप ज्ञान के साथ प्रभु में ही आश्रित हैं।
Subject
एकरात्र-द्विरात्र

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