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Atharvaveda - Mantra 22

Atharvaveda 11/6/22

10 Sukta
23 Mantra
11/6/22
Devata- चन्द्रमा अथवा मन्त्रोक्ताः Rishi- शन्तातिः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- पापमोचन सूक्त
Mantra with Swara
या दे॒वीः पञ्च॑ प्र॒दिशो॒ ये दे॒वा द्वाद॑श॒र्तवः॑। सं॑वत्स॒रस्य॒ ये दंष्ट्रा॒स्ते नः॑ सन्तु॒ सदा॑ शि॒वाः ॥

या: । दे॒वी: । पञ्च॑ । प्र॒ऽदिश॑: । ये । दे॒वा: । द्वाद॑श । ऋ॒तव॑: । स॒म्ऽव॒त्स॒रस्य॑ । ये । दंष्ट्रा॑ । ते । न॒: । स॒न्तु॒ । सदा॑ । शि॒वा: ॥८.२२॥

Mantra without Swara
या देवीः पञ्च प्रदिशो ये देवा द्वादशर्तवः। संवत्सरस्य ये दंष्ट्रास्ते नः सन्तु सदा शिवाः ॥

या: । देवी: । पञ्च । प्रऽदिश: । ये । देवा: । द्वादश । ऋतव: । सम्ऽवत्सरस्य । ये । दंष्ट्रा । ते । न: । सन्तु । सदा । शिवा: ॥८.२२॥

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Meaning
१. (या:) = जो (देवी:) = दिव्य-गुणों से युक्त (पञ्च) = [पचि विस्तारे] विस्तृत (प्रदिश:) = प्रकृष्ट दिशाएँ हैं और (ये) = जो (देवा:) = दिव्य गुणयुक्त (द्वादश ऋतव:) = ['मधुश्च माधवश्व'-तै० आ० १।४।१।४।१] दो-दो मासों से बनी हुई. अतएव छह होती हुई भी बारह मासोवाली ऋतुएँ हैं और (ये) = जो (संवत्सरस्य दंष्ट्रा) = आश्विन मास के अन्तिम आठ व कार्तिक मास के सारे दिन वर्ष रूप की यमदंष्ट्रा हैं [इन दिनों में रोग अधिक होते हैं, अतः इन्हें यमदंष्ट्रा कहा गया है], (ते) = वे सब (न:) = हमारे लिए (सदा) = सदा (शिवा:) = कल्याणकर (सन्तु) = हों।
Essence
सब दिशाएँ, ऋतुएँ व वर्ष के यमदंष्ट्रा नामक काल भी हमारे लिए कल्याणकर हों
Subject
दिशाएँ, ऋतुएँ व संवत्सर की दंष्ट्राएँ