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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 11/5/6

10 Sukta
26 Mantra
11/5/6
Devata- ब्रह्मचारी Rishi- ब्रह्मा Chhanda- शाक्वरगर्भा चतुष्पदा जगती Suktam- ब्रह्मचर्य सूक्त
Mantra with Swara
ब्र॑ह्मचा॒र्येति स॒मिधा॒ समि॑द्धः॒ कार्ष्णं॒ वसा॑नो दीक्षि॒तो दी॒र्घश्म॑श्रुः। स स॒द्य ए॑ति॒ पूर्व॑स्मा॒दुत्त॑रं समु॒द्रं लो॒कान्त्सं॒गृभ्य॒ मुहु॑रा॒चरि॑क्रत् ॥

ब्र॒ह्म॒ऽचा॒री । ए॒ति॒ । स॒म्ऽइधा॑ । सम्ऽइ॑ध्द: । कार्ष्ण॑म् । वसा॑न: । दी॒क्षि॒त: । दी॒र्घऽश्म॑श्रु: । स: । स॒द्य: । ए॒ति॒ । पूर्व॑स्मात् । उत्त॑रम् । स॒मु॒द्रम् । लो॒कान् । सम्ऽगृभ्य॑ । मुहु॑: । आ॒ऽचरि॑क्रत् ॥७.६॥

Mantra without Swara
ब्रह्मचार्येति समिधा समिद्धः कार्ष्णं वसानो दीक्षितो दीर्घश्मश्रुः। स सद्य एति पूर्वस्मादुत्तरं समुद्रं लोकान्त्संगृभ्य मुहुराचरिक्रत् ॥

ब्रह्मऽचारी । एति । सम्ऽइधा । सम्ऽइध्द: । कार्ष्णम् । वसान: । दीक्षित: । दीर्घऽश्मश्रु: । स: । सद्य: । एति । पूर्वस्मात् । उत्तरम् । समुद्रम् । लोकान् । सम्ऽगृभ्य । मुहु: । आऽचरिक्रत् ॥७.६॥

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Meaning
१. आचार्यकुल में पढ़कर घर के प्रति वापस आता हुआ (ब्रह्मचारी) = ज्ञान में विचरण करनेवाला युवक एति घर के प्रति आ रहा है। यह (समिधा समिद्धः) = ज्ञानदीप्ति से दौस है, (कार्ष्णं वसान:) = कृष्ण मृगचर्म को ओढ़े हुए है। (दीक्षित:) = इसने व्रतों को ग्रहण किया है। (दीर्घश्मश्रु:) = बड़े-बड़े मुखस्थ बालोंवाला है। स्पष्ट है कि आचार्यकुल में बहुत वस्त्रों की व्यवस्था न थी, न ही वहाँ नापित का स्थान था। २. (स:) = वह ब्रह्मचारी (सद्यः) = शीघ्र ही पूर्वस्मात् [समुद्रात्] ब्रह्मचर्याश्रमरूप पूर्वसमुद्र से (उत्तरं समुद्रम्) = गृहस्थरूप उत्तरसमुद्र को (एति) = प्राप्त होता है। ब्रह्मचर्याश्रम के बाद गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है। (लोकान् संगृभ्य) = पृथिवी, अन्तरिक्ष व युलोक आदि तीनों लोकों का सम्यक ज्ञान ग्रहण करके-शरीर [पृथिवी] को दृढ़, हृदय [अन्तरिक्ष] को पवित्र व मस्तिष्क [धुलोक] को दीप्स बनाकर-(मुहुः आचरिकत्) = अतिशयेन कर्तव्य-कर्मों में प्रवृत्त होता है।
Essence
आचार्यकुल में तपस्या के द्वारा ज्ञानदीसि से दीप्त होकर यह ब्रह्मचारी आचार्य से दीक्षा लेकर घर लौटता है-गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है और 'दृढ़ शरीर, पवित्र हृदय व दीस मस्तिष्क' बनकर कर्तव्य-कर्मों को सम्यक्तया करनेवाला बनता है।
Subject
समावर्तन