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Atharvaveda - Mantra 20

Atharvaveda 11/4/20

10 Sukta
26 Mantra
11/4/20
Devata- प्राणः Rishi- भार्गवो वैदर्भिः Chhanda- अनुष्टुब्गर्भा त्रिष्टुप् Suktam- प्राण सूक्त
Mantra with Swara
अ॒न्तर्गर्भ॑श्चरति दे॒वता॒स्वाभू॑तो भू॒तः स उ॑ जायते॒ पुनः॑। स भू॒तो भव्यं॑ भवि॒ष्यत्पि॒ता पु॒त्रं प्र वि॑वेशा॒ शची॑भिः ॥

अ॒न्त: । गर्भ॑: । च॒र॒ति॒ । दे॒वता॑सु । आऽभू॑त: । भू॒त: । स: । ऊं॒ इति॑ । जा॒य॒ते॒ । पुन॑: । स: । भू॒त: । भव्य॑म् । भ॒वि॒ष्यत् । पि॒ता । पु॒त्रम् । प्र । वि॒वे॒श॒ । शची॑भि:॥६.२०॥

Mantra without Swara
अन्तर्गर्भश्चरति देवतास्वाभूतो भूतः स उ जायते पुनः। स भूतो भव्यं भविष्यत्पिता पुत्रं प्र विवेशा शचीभिः ॥

अन्त: । गर्भ: । चरति । देवतासु । आऽभूत: । भूत: । स: । ऊं इति । जायते । पुन: । स: । भूत: । भव्यम् । भविष्यत् । पिता । पुत्रम् । प्र । विवेश । शचीभि:॥६.२०॥

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Meaning
१. (देवतासु) = सूर्य, चन्द्र, विद्यत, अग्नि आदि सब देवों में (गर्भ:) = गर्भरूप होता हुआ (अन्त:चरति) = अन्दर विचरण करता है। (आभूतः) = समन्तात् व्याप्त हुआ-हुआ (भूत:) = [जातः] नित्य होता हुआ (स: उ) = वह प्राण ही (पुनः जायते) = उस-उस शरीर के साथ फिर उत्पन्न-सा होता है। २. (भूत:) = नित्य वर्तमान (स:) = यह प्राण (भूतम्) = भूतकालावच्छिन्न वस्तु को, (भविष्यत्) = भाविकालावच्छिन्न उत्पत्स्यमान वस्तु को (शचीभिः) = अपनी शक्तियों से (प्रविवेश)  इसप्रकार प्रविष्ट होता है, जैसेकि (पिता पुत्रम्) = पिता अपने पुत्र में अपने अवयवों से प्रविष्ट होता है। प्राण पिता है, यह उत्पन्न जगत् उसका पुत्र है। इसमें वह प्रविष्ट है।
Essence
सूर्यादि सब देवों में वह प्राणात्मा प्रभु प्रविष्ट हुए-हुए हैं, इसी से ये देव देवत्व को प्राप्त हुए हैं। भूत, भविष्यत् सभी वस्तुओं में प्रभु ही अपनी शक्तियों से प्रविष्ट हैं।
Subject
गर्भरूप से रहनेवाला 'प्राण' प्रभु