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Atharvaveda - Mantra 16

Atharvaveda 11/4/16

10 Sukta
26 Mantra
11/4/16
Devata- प्राणः Rishi- भार्गवो वैदर्भिः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- प्राण सूक्त
Mantra with Swara
आ॑थर्व॒णीरा॑ङ्गिर॒सीर्दै॒वीर्म॑नुष्य॒जा उ॒त। ओष॑धयः॒ प्र जा॑यन्ते य॒दा त्वं प्रा॑ण॒ जिन्व॑सि ॥

आ॒थ॒र्व॒णी: । आ॒ङ्गि॒र॒सी: । दैवी॑: । म॒नु॒ष्य॒ऽजा: । उ॒त । ओष॑धय: । प्र । जा॒य॒न्ते॒ । य॒दा । त्वम् । प्रा॒ण॒ । जिन्व॑सि ॥६.१६॥

Mantra without Swara
आथर्वणीराङ्गिरसीर्दैवीर्मनुष्यजा उत। ओषधयः प्र जायन्ते यदा त्वं प्राण जिन्वसि ॥

आथर्वणी: । आङ्गिरसी: । दैवी: । मनुष्यऽजा: । उत । ओषधय: । प्र । जायन्ते । यदा । त्वम् । प्राण । जिन्वसि ॥६.१६॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. जो ओषधियाँ मन की स्थिरता में सहायक होती हैं वे [अ-थर्व] 'आथर्वणी' कहाती हैं। अंग-प्रत्यंग में रस का सञ्चार करनेवाली ओषधियाँ 'आंगिरसी' हैं। देवों, अर्थात् सब इन्द्रियों को निर्दोष व सशक्त बनानेवाली ओषधियाँ "दैवी' हैं। विचारपूर्वक कर्म करनेवाले मनुष्य 'मत्वा कर्माणि सीव्यति' को जन्म देनेवाली 'मनुष्यजा' कहलाती हैं। ये ('आथर्वणी:, आंगिरसी:, दैवी: उत मनुष्यजा:') = आथर्वणी, आंगीरसी, दैवी और मनुष्यजा (ओषधयः) = ओषधियाँ (प्रजायन्ते) = तभी पैदा होती हैं, (यदा) = जब हे (प्राण) = प्राणात्मन् प्रभो! (त्वं जिन्वसि) = आप प्रीणित करते हैं। हे प्राण! आप ही वृष्टिप्रदान से इन ओषधियों का पोषण करते हैं।
Essence
प्रभकृपा से वृष्टि होकर उन विविध ओषधियों की उत्पत्ति होती है, जोकि 'मानस स्थिरता में सहायक होती हैं, अंग-प्रत्यगों में रस का सञ्चार करती हैं, इन्द्रियों को निर्दोष व सशक्त बनाती हैं तथा हमें विचारपूर्वक कर्म करनेवाला करती हैं।
Subject
चार प्रकार की ओषधियाँ