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Atharvaveda - Mantra 14

Atharvaveda 11/4/14

10 Sukta
26 Mantra
11/4/14
Devata- प्राणः Rishi- भार्गवो वैदर्भिः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Suktam- प्राण सूक्त
Mantra with Swara
अपा॑नति॒ प्राण॑ति॒ पुरु॑षो॒ गर्भे॑ अन्त॒रा। य॒दा त्वं प्रा॑ण॒ जिन्व॒स्यथ॒ स जा॑यते॒ पुनः॑ ॥

अप॑ । अ॒न॒ति॒ । प्र । अ॒न॒ति॒ । पुरु॑ष: । गर्भे॑ । अ॒न्त॒रा । य॒दा । त्वम् । प्रा॒ण॒ । जिन्व॑सि । अथ॑ । स: । जा॒य॒ते॒ । पुन॑: ॥६.१४॥

Mantra without Swara
अपानति प्राणति पुरुषो गर्भे अन्तरा। यदा त्वं प्राण जिन्वस्यथ स जायते पुनः ॥

अप । अनति । प्र । अनति । पुरुष: । गर्भे । अन्तरा । यदा । त्वम् । प्राण । जिन्वसि । अथ । स: । जायते । पुन: ॥६.१४॥

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Meaning
१. (पुरुषः) = अन्न-रस परिणामरूप शरीर को धारण करनेवाला पुरुष (गर्भे अन्तरा) = स्त्री के गर्भाशय के मध्य में (अपानति प्राणति) = प्राण का प्रवेश होने पर अपान व प्राणन-व्यापारों को करता है। हे प्राण! तु शुक्रशोणितावस्था में ही पुरुषशरीर में प्रवेश करके उसके परिणाम के लिए प्राणापान वृत्तियों को पैदा करता है। २. हे (प्राण) = प्राणात्मन् प्रभो! (यदा) = जब आप (जिन्वसि) = गर्भीभूत पुरुष को मातृयुक्त आहार से परिणत अन्न-रस से प्रीणित[पुष्ट] करते हो, (अथ) = तब ही (सः पुन: जायते) = वह पुरुष स्वार्जित परिपक्व पुण्य-पाप के फल के उपभोग के लिए पुनः भूमि पर उत्पन्न होता है।
Essence
मातृगर्भ में प्राण का प्रवेश होने पर ही प्राणापान का व्यापार चलता है। प्राण ही गर्भीभूत पुरुष को पुष्ट करके पृथिवी पर जन्म देता है।
Subject
सर्वोत्पादक 'प्राण'