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Atharvaveda - Mantra 10

Atharvaveda 11/4/10

10 Sukta
26 Mantra
11/4/10
Devata- प्राणः Rishi- भार्गवो वैदर्भिः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- प्राण सूक्त
Mantra with Swara
प्रा॒णः प्र॒जा अनु॑ वस्ते पि॒ता पु॒त्रमि॑व प्रि॒यम्। प्रा॒णो ह॒ सर्व॑स्येश्व॒रो यच्च॑ प्रा॒णति॒ यच्च॒ न ॥

प्रा॒ण: । प्र॒ऽजा: । अनु॑ । व॒स्ते॒ । पि॒ता । पु॒त्रम्ऽइ॑व । प्रि॒यम् । प्रा॒ण: । ह॒ । सर्व॑स्‍य । ई॒श्व॒र: । यत् । च॒ । प्रा॒णति॑ । यत् । च॒ । न ॥६.१०॥

Mantra without Swara
प्राणः प्रजा अनु वस्ते पिता पुत्रमिव प्रियम्। प्राणो ह सर्वस्येश्वरो यच्च प्राणति यच्च न ॥

प्राण: । प्रऽजा: । अनु । वस्ते । पिता । पुत्रम्ऽइव । प्रियम् । प्राण: । ह । सर्वस्‍य । ईश्वर: । यत् । च । प्राणति । यत् । च । न ॥६.१०॥

Meaning
१. (प्राण:) = प्राण (प्रजा:) = देव, तिर्यक मनुष्य आदि सब प्रजाओं को (अनुवस्ते) = अनुक्रमेण आच्छादित किये हुए हैं। उनके शरीरों को नाड़ियों के द्वारा व्याप्त करके रह रहा है। यह प्राण प्रजाओं को इसप्रकार आच्छादित किये हुए हैं, (इव) = जैसेकि पिता (प्रियं पुत्रम्) = अपने प्रिय पुत्र को अपने वस्त्र से आच्छादित करता है। २. (यत् च) = और जो जङ्गमात्मक वस्तु (प्राणति) = प्राणन व्यापार करती है( यत् च न) = और जो स्थावरात्मक वस्तु प्राणन-व्यापार नहीं करती, (प्राण:) = प्राण (ह) = निश्चय से (सर्वस्य) = उस सबका (ईश्वर:) = ईश्वर है। स्थावरों में भी आत्मा से अविनाभूत यह प्राण निरुद्धगतिवाला होता हुआ अन्दर है ही।
Essence
प्राण सब प्रजाओं को अपने से आच्छादित करके सब रोगों के आक्रमणों से बचाता है।
Subject
सर्वस्य ईश्वरः प्राण:

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